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बुधवार, दिसंबर 07, 2016

देवदूत द्वार पर .....


 मृत्यु शाश्वत  सत्य है ....
किसलिए  विलाप  हो ?
पापमय हो जीवन अगर....
 फ़िर क्यूँ न पश्चाताप हो ?
_____________ डॉ .प्रतिभा स्वाति

रविवार, अक्टूबर 16, 2016

लिख देती हूँ ......


____________________________________

 मन जब रोता है !
तोड़ देती हूँ रीत ! 
लिख देती हूँ ,
ख़ुशी का गीत !


लिखना  ज़ुरूरी है !
दिखना ज़ुरूरी है !

कौन रूठों को 
अब मनाता है ?



आप लिखें वेदना 
और... बिचारा पाठक 
वाह -वाह कर जाता है !
दोष उसका नहीं ,वो 
शिष्टाचार निभाता है !

कोई अशिष्ट नहीं ,
मेरे आसपास !
पर सभी अज़नबी 
न मोह ,न आस !

भीड़ में हूँ 
मगर हूँ तो तन्हा 
घर में रहूँ 
या यहाँ वहां 

ख़ुशी बंट जाती है 
यूँ ही हंस-हंस 
गम कौन लेता है 
दो तो ख़ुशी बस 

मै मनाती हूँ, अब 
दर्द का उत्सव 
दीवारें चुप रहेंगी !

कान होते हैं 
बिना मुहं के 
 वे कैसे कहेंगी ?

घर मुझे अक्सर
समझाता  है 
मुझे कुछ -कुछ
समझ आता है 

जिन्हें तुम बेजान 
कहते हो 
वो सब चीज़ें बोलती हैं
बात करती हैं _____
जब रोती हूँ ,तब 
भीगता है तकिया 
बंद हो जाता है 
दरवाज़ा !
नहीं हिलते परदे !
चूल्हा  नहीं जलता !
संगीत सिसकता है !
पौधे तब मुझसे 
नहीं मांगते पानी !

ये दरो दीवार 
आह भरते हैं 
वाह -वाह नही करते !
तुम जीवंत ये निर्जीव !

 वेदना को अब सहारा नहीं ,
 एक माकूल जगह चाहिए ?

_______________________ डॉ.प्रतिभा स्वाति

मंगलवार, अक्टूबर 04, 2016

लकीरें दो ... देती है दिलासा मुझे

__________ वो जो छोटी  लकीर और बड़ी लकीर का क़िस्सा  है .... खत्म  ही नहीं  होता !जीवन  इन लकीरों  के साथ इस से उस पार  हुआ जाता  है .....
________________ जब  भी मुझे अपनी  मुश्किलों  की लकीर  बड़ी  लगी , मै   देश के हालात  पर जो  लकीर है उसे देख लेती  हूँ , जो  लकीर निचले  तबके  की भूख  पर है उसे , जो लकीर आज  स्त्री की अस्मत पर है , जो लकीर आज सत्ताई किरदारों  पर हैं .... जो लकीर ...
_____________ ओह ! अनगिनत  लकीरें ,वो भी  बड़ी -बड़ी - बहुत बड़ी , तब मुझे  अपनी लकीर एक  बिंदु -सद्रश  प्रतीत होने  लगती है :)
______ तो क्या दर्द तुलनात्मक है ?
_________________ डॉ. प्रतिभा स्वाति





आभार / तहेदिल से , कुसुम जी :) 



शनिवार, सितंबर 17, 2016

मोक्ष.....




____________" मुझे , वो याद आने लगे हैं  " की व्याख्या  करनी चाहिए ? मैं  ये नहीं लिख सकती का कारण  बताना चाहिए ? या सीधे  कहनी  पर आ जाना चाहिए कि मैं अब इस ब्लॉग पर haikubazi या छुटपुट  कविताई नहीं करुँगी :)

___________ भले मेरी टाइपिंग  कि स्पीड कम है . मुझे typ करना उबाऊ लगता है ( जो  कि एक writer के हित में  नहीं है ) पर अब जब 3 साल  होने आए  ब्लॉग पर तब मुझे इस सबसे  कतराना ठीक  नहीं लगता .वरना जाने कब ईद मन जाए , .....ब... की मां ज्यादा दिन खैर नहीं मना सकती ( मेरे  मुस्लिम भाई मुझे मुआफ़  करेंगे , अल्ला कसम मैं अपने रास्ते  जा रही हूँ बस मिसाल के तौर पर  हवाला दिया है )

_________________________________

 मोक्ष 
____________

              नींद  खुलते ही कुछ ख़्वाब पलकों  की किनारों से छिटककर नज़दीक  ही  मुडेर पर जा  बैठे और  मुझे  देखकर मुस्कुराने  लगे ..........मैं  अब भी सोच में हूँ ...आख़िर रात सपने में क्या देखा था !

              कोई  था जो मुझे जगा रहा था ! कोई तो था ..... कौन  मुझे लेकर  कलम  गुदगुदा  रहा था ........ सियाही  के वो छींटे  शायद  अब भी  बांह पर हों .... मैंने  देखा हाथ तो साफ़ थे ! हथेली  एकदम  ख़ाली .... हाँ  ,कुछ  रेखाएं ,इधर-  उधर आ - जा रही थीं !

              मैं कबसे इन रेखाओं को ........इन्द्रधनुष  की शक्ल   देना  चाहती हूँ ! जब  हथेली  पर  इन्द्रधनु  हो ....तब अँगुलियों  की  पोरों  पर ,शंख  या चक्र  नहीं , इनकी  जगह  पर सूरज - चाँद होना  चाहिए ! पूरा  आसमान मैं अपनी  मुट्ठी  में  चाहती  हूँ ? मन  ठठा  पड़ा  जैसे मुझ  ही पर ! और .......मुंडेर  पर  बैठा  ख़्वाब  भी  खिलखिला  पड़ा .
             
                   अर्रर्रे  हाँ  ! यही  तो देखा था ,कल  रात  सपने में......कितनी   ख़ुश  थी  मैं........सचमुच , कुछ  ख़्वाब ,यूँ  ही  चले आते  हैं ...... खुशियाँ  लेकर ! मैंने  इस बार वहां   मुंडेर की तरफ़  मुस्कुराके  देखा , ख़्वाब  ग़ायब  था . उसकी जगह  बैठी  हक़ीकत मुझे  चिढ़ा  ही रही थी  समझो .उफ़ !!

                  हक़ीकत और कर  भी क्या सकती  है ...तीख़ी - कड़वी - बेमज़ा - बदज़ायका - बेमुलाहिज़ा !! मैंने  घूरकर  उसे देखा  तो उसने  भी मुझे ......ज़ाहिर  है वही रिस्पोंस  दिया :) तब  मैंने आँखे  बंद कर लीं , फ़िर से . मैं अब ....अभी  जागना  नहीं ,सोना  चाहती  हूँ . मुझे  ये हक़ीकत  बिल्कुल  पसंद  नहीं ........ जब देखो , हाथ  धोकर ख़्वाबों  के पीछे  पड़ी रहती  है .

                  ना  मैं इस यथार्थ   से डरती  या  घबराती  नहीं हूँ .ना  ही उसे कुसूरवार  ठहराने  की हिमाक़त  कर रही  हूँ . पर इसका  मुक़ाबला  करके अघा  चुकी  हूँ . न  वो  जीतती  है न  मैं  हारती  हूँ .......

                 इतने सारे  शर -सद्र्श  कंटक !! क्या  मै  भीष्म  हूँ ? अगर होती .....तब भी मैं  शरशैया  पर प्राण ना त्यागती ...... मुझे  इच्छा  मृत्यु  का  वरदान  यूँ  विस्मृत ना   होता .... मोक्ष  तो अभीप्सित  रहता  ही  खैर ........

                         मान  लो मैं हूँ ....... उस शैय्या  पर भीष्म नहीं .....तब मुझे  मंजूर  होता इंतज़ार ....युद्ध - विराम का .... अरे ! प्रॉपर  ट्रीटमेंट   अनिवार्य  था ....... विजय  के बाद  क्या फर्ज़ - फ़राइज़  यूँ खत्म  हुआ  करते  हैं ?

                       राम की जलसमाधि  या  कृष्ण  का व्याघ्र  से ..... या सीता का  धरती में समा  जाना  समझ में आता  है ............ पर भीष्म .... पितामह .....सातवें  देव .....गंगा - पुत्र ...... यूँ ,प्राणत्याग  ? नहीं  ....

                         हाय  विधाता  मुझे  दो ये  वरदान ..... मै  आत्महत्या  के खिलाफ़  हूँ .अरे  ये ज़ुर्म  है ..... कायरता  है .... पलायन  है ..... जीवन  का  अपमान  है .... कर्तव्यों  को  पीठ दिखाना  उचित  नहीं .... आजीवन  कर्तव्यों  का  निर्वाह  करूंगी ईमानदारी  से ..... पर  मुझे  चाहिए  " मोक्ष "  इस  धरती  की आबादी अब सरकार के  नियंत्रण में  नहीं ....... विधाता  अब  बंद  करो ये ............ पुनर्जन्म   का सिलसिला ! हर  मरने  वाले  को  मिले  मोक्ष ................ और हमे मिले  उनका आशीर्वाद ....आजीवन .....

--------------------------( पितृ - पक्ष  पर हर पितृ - पूर्वज  को समर्पित )

________________________ डॉ. प्रतिभा स्वाति



शुक्रवार, सितंबर 16, 2016

हमेशा ...जमाना ही क्यूँ बदलता है ?

______________________________
        परिस्थियाँ  बदलती  हैं ....धीरे -धीरे ! इतनी  धीरे कि इस  बदलाव  से हम  बिल्कुल अनभिज्ञ रहते हैं . फ़िर  पचास  साल बाद ....अचानक भौचकिया  जाते  हैं ...ये सब कब कैसे हुआ ? इसका ना तो जवाब होता है ना उस जवाब  का  कोई मतलब ! यानी  अहमियत या  महत्व !
_______________ और हम  तमाम  सवालों पर  विराम  लगाने  की  नाकामयाब  कोशिश करते  हैं , अपने आपको  ख़ुद तक के आगे  पाक-दामन ज़ाहिर  करने के लिए , बड़ी संजीदगी  से हर  ज़माने  में एक  पचास- साला  प्रौढ़  ये  कहता  मिला है  इतिहास की  किताबों  में कि .........'.ज़माना  बदल  गया है "
___________ हमे  कोई उनसे  ये पूछकर  बताए कि  ज़माना  यूँ ही बदल गया ? बिना  कुछ किये ? जीहाँ  , "बिना  कुछ किये"  यही  इस सवाल  का जवाब  है . यदि  हमने  कुछ  नहीं  किया तो ज़माना  यूँ  ही  बदलता  रहेगा ! इसे  अब  रोकना होगा ! और  कितना बदलना  है ? यदि  बदलाव के मायने चरित्र  का हनन है . मूल्यों  का अवमूल्यन  है . 
______________ यदि  बदलाव  का मतलब दुराचार है . गैरज़िम्मेदारी  है . स्वाभिमान का तिरोहित हो जाना है . सम्वेदना  का भूखा  रहना और रिश्तों  का  ज़लील होना  है . पैसे के पीछे भागना है . गलतियों के लिए दूसरों को ज़िम्मेदार  ठहराना है . उफ़ ! ये अंतहीन  फ़ेहरिस्त .... अब बस ! हमें उस जुमले पे अमल नही करना कि ज़माना .... हमें आज से अभी से उस कल के लिए कुछ करना होगा .... मैं  नहीं चाहती कि अब ज़माना और बदले . बहुत तो बदल गए ! 
___________ बदलाव आए तो बेहतरी के लिए ! सुख -समृद्धि -संतोष के लिए ! बदलाव अनुकरणीय हो , जिसपर हम नाज़ कर सकें और गर्व से कह सकें कि --------------------------------------------------- " जमाना  बदल गया है "
______________ डॉ. प्रतिभा स्वाति

शनिवार, अगस्त 27, 2016

कोई पीर ..





बड़ी मायूस है ........ ख़ुशी मुझसे ,
ये ही की ........मैं कौन / कहाँ हूँ !
मिले तुमको .......तो बता देना ,.
मैं ग़म की ................इन्तेहाँ हूँ !
-------------------------------------------------डॉ प्रतिभा स्वाति














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