मंगलवार, अक्तूबर 04, 2016

लकीरें दो ... देती है दिलासा मुझे

__________ वो जो छोटी  लकीर और बड़ी लकीर का क़िस्सा  है .... खत्म  ही नहीं  होता !जीवन  इन लकीरों  के साथ इस से उस पार  हुआ जाता  है .....
________________ जब  भी मुझे अपनी  मुश्किलों  की लकीर  बड़ी  लगी , मै   देश के हालात  पर जो  लकीर है उसे देख लेती  हूँ , जो  लकीर निचले  तबके  की भूख  पर है उसे , जो लकीर आज  स्त्री की अस्मत पर है , जो लकीर आज सत्ताई किरदारों  पर हैं .... जो लकीर ...
_____________ ओह ! अनगिनत  लकीरें ,वो भी  बड़ी -बड़ी - बहुत बड़ी , तब मुझे  अपनी लकीर एक  बिंदु -सद्रश  प्रतीत होने  लगती है :)
______ तो क्या दर्द तुलनात्मक है ?
_________________ डॉ. प्रतिभा स्वाति





आभार / तहेदिल से , कुसुम जी :) 



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