सोमवार, फ़रवरी 05, 2018

अच्छे दिन ...



 प्रजातंत्र  के मन्त्र से  ...
जनता  है  बेहाल !
खाल पहिन के शेर की...
चालें चले श्रगाल !
----------------------------- डॉ .प्रतिभा स्वाति







गुरुवार, दिसंबर 28, 2017

साल अठरवां लागा रे



 बीतीं  बीस , सदी  इक्कसवीं ,
साल  अठरवां  लागा  रे !
खुली गहन  निद्रा  क्या  बोलो ,
इनसान सहज ही जागा  रे ?

उलटी छत पर पड़ी पतंग ,
टूटा जबसे  धागा  रे !
चिड़िया को बस दाना-दुनका , (पक्षी-गण सब भूखे -प्यासे )
मोती चुगता  कागा रे !
लो साल अठरवां लागा रे !!! 

समय सरित  का  भीषण  वेग ,
बह  गए  जाने  कितने साल !
उड़  गई कब सोने की चिड़िया ,
मेरा देश हुआ, इतना कंगाल !

लोकतंत्र में नित -नए  चोचले ,
हाय ! हमें  भरमाते  हैं !
उजले  वस्त्रों  में  नेतागण ,
सभी  कलंक  छुपाते  हैं !

रोजगार  की बाँट  जोहता ,
दर-दर युवा  भटक  रहा !
घोषणाओं  का बजे  ढिढोरा ,
जन -मानस  को  खटक रहा !

वो अच्छे दिन ,कब आएँगे ?
बन से कब लौटेंगे राम ?
इधर कुआं उधर खाई  है ,
सरहद  पर हर-दिन कोहराम !

बिना हवा के कबसे बोलो ?
ये कैसी उड़  रही  पतंग ?
चोर -चोर  मौसेरे  भाई ...
कैसे इनमें छिड़ गई जंग ?

वोट -नोट मुक्तक सब ,
चुनाव  में चुगता  कागा  रे !
बीतीं  बीस ,सदी  इक्कसवीं ,
साल अठरवां  लागा रे !

लो साल अठरवां लागा  रे !!!
_______________________ डॉ .प्रतिभा स्वाति  



मंगलवार, दिसंबर 26, 2017

किस्सा -ए- अगिया बैताल ?

  मन्नू मास्टर....
           " भूत -प्रेत  कुछ  नहीं होते ! ये  वहम  है  इनसान  का ! मन  का डर !और  यदि  होते  भी  हों तो वे  इनसान से दूर रहना  चाहते  हैं " यही  कहते  थे मन्नू  मास्टर . आज से 40  साल  पहले . पर गूगल पर तो हैं ,आज  भी - भूत -प्रेत -पिशाच -बेताल  . सर्च  कर  लीजिये,  एक स्निप शॉट  ये  है :) 
         
           

                
                  वैसे गूगल  पर और  भी तमाम  link  हैं ,जिनके  होने  का औचित्य  या उपयोगिता  पर प्रश्न  उठ  सकता  है ! लेकिन   देश  यूँ ही तमाम  विपदाओं  से घिरा  है ,इस  मामूली  बात  को इग्नोर  किया जा सकता  है ! स्निप  शॉट  देने  का  कोई  विशेष  अभिप्राय  नहीं .अब  चूँकि मैं उनकी  बात आज इतने सालों  बाद याद  कर रही  हूँ तो यूँ  ही सर्च मार दिया की  बेताल के बारे में ये साईट  क्या कहता  है :) मुझे  मास्टर  साहेब का  क़िस्सा जब  आ  ही गया तो  फ़िर उसे  आप  तक  पहुँचाने  में  कोई हर्ज़  नहीं . डायरेक्ट  टाइप  करती  हूँ आजकल ,ये  सब  कहीं  लिख नहीं  रखा इसलिए व्यवधान  ज्यादा आते  हैं .किसी  सम्पादक या आलोचक  की  नज़र  इनायत  हुई तो ,मुझे  मालूम  है फ़िर  मुझ  जैसे  कहानीकार  का क्या  हश्र होगा ! पर  हम  इतने  भी कायर  नहीं :) 

            अगर  कुछ  लिखना है तो लिखकर  ही  मन शांत  होगा ! विचार  को प्रवाह  मिलना  चाहिए ! वर्ना  मानसिकता  कुंठित  होने  का  खतरा  है :) मैं ये  रिस्क नहीं ले सकती . मनोविज्ञान  दमन  के विरोध में काफी  कुछ कहता  है . सकारात्मक  सोच को स्थान  देने  के लिए एक रिक्त का भाव अनिवार्य  है .चिन्तन  की प्रक्रिया में जिस एकांत  का अवलम्बन किया  जाता है वहां  ये अतीत  की स्मृतियाँ  बाधा  पैदा करती  हैं ,ये मेरा  अनुभव  है ! बात  मन से निकल जानी चाहिए . मुंह  से  न निकले तो लिखकर  निकाल  दीजिये :)

            मन्नू   मास्टर  का हिंदी ,संस्कृत , अंग्रेज़ी , उर्दू पर  वर्चस्व  था .उम्र  होगी  कोई  70  के आसपास . उनके  7  सन्तान  थी . चार बेटियाँ  और  3 बेटे . सभी  पढ़े -लिखे और अच्छे  पदों  पर ,उस समय  ये  सब  नामुमकिन  था ! बड़ा  बेटा सेल टैक्स ऑफिसर  था . मंझला  इंदौर  के  सेकसरिया  कोलिज का जेम्स बांड ( वो ,वहां  प्रोफेसर था ) तीसरा  एग्रो -इंजीनियर . एक बेटी गोल्ड  मेडलिस्ट थी ( है ) दूसरी  डबल m.a. ( है ) तीसरी  ने  भी pg  किया  था , वो  भी  है :) पर  अब मन्नू  मास्टर  नहीं  हैं ! उनका  स्वर्गवास  हुए ,एक अर्सा  हुआ ! उनकी  कही  कहानियाँ  - किस्से - लतीफ़े  मुझे  ऐसे  याद  हैं  ,जैसे  अभी  सुने  हों ! 

                   लेकिन आज से  लगभग 40 पहले उन्होंने  सुनाया  था " अगिया  - बैताल  का किस्सा जो  मुझे  याद है ! एक आग  का गोला उनके  पास  से   गुज़रा  था ! वो उस समय  किशोर  ही थे ! BSF में एक जवान  की हैसियत  से उन्हें  भर्ती  किया  गया  था . वे  नाईट  शिफ्ट  में  अकेले  तैनात  थे .




               हम  सबने अब तक चंदामामा ,जो एक समय की लोकप्रिय  बाल -मैगज़ीन  थी ,उसमें विक्रम और वेताल  को  पढ़ा  है , टीवी  पर देखा  है.,,बस . पर, वो थे क्या ? इतिहास  गवाह  है - विक्रम  थे ! पर  बैताल  आज  भी  इतिहास  का  हिस्सा  बन  सका ? नहीं ! इतिहास  कोई  गल्प  नहीं . ये  किस्से  यूँ  ही एकदम  खत्म  न होंगे ! सदी  लग  जाएगी . 


              
             इंदौर  का  एरोड्रम  वाला  इलाका कई  सालों  तक ,कई  किलोमीटर  सुनसान  पड़ा  रहा था . दिन  में  भी लोग उधर  जाने से कतराते  थे . पिलियाखाल  का पुल शहर  की सीमा  समझी  जाती  थी .अब तो पचासों  कालोनी  कट  गई सैकड़ों  इमारतें  बन  गई और लाखों लोगों  की  बस्ती  हो  गई . सब  जंगल  गायब . तो अब वो भूत -प्रेत  भी भाग  गए  होंगे ? पहले न वहां  ढंग  की सड़क  थी न रात  में लाईट की व्यवस्था . आवागमन  के लिए वाहन  का उपलब्ध  होना तो सम्भव  ही  नहीं  था . तब  वहां  भय  के भूत  घूमते  थे ,लोगों  को डर  लगता  था . 

              एरोड्रम  के  जस्ट पहले आता  है b.s.f . जहाँ  मास्टर  साहेब  ड्यूटी पर थे . रात में दो साथी और  थे . उनसे  वरिष्ठ  थे .उम्र और ओहदे दोनों में . हमारे  मास्टर साहेब की कम उम्री और बहादुरी  का टेस्ट  लिया जाना था या  रेगिंग  ली जा रही थी या मज़ाक  की आड़ में दोनों अपनी  मक्कारी  को पनाह दे  रहे थे ? " अच्छा बच्चा  क्या  रात में बिना  डरे तुम अकेले  गेट पर ड्यूटी  दे  सकते हो ? " ये सवाल था ? परिहास था ? या चुनौती ? "जवान डरते  नही , डर उनसे डरता  है " जीवन  के  संघर्ष ने  जवान  को  निर्भीक  बना  दिया  था .बटालियन  का  सबसे  छोटा  सदस्य  था . विनम्र  भी .सबका लाड़ला  भी .सभी  जानते  थे उसके परिवार में सिवा  ताऊ  के  कोई  नहीं . उसका ब्याह  हो चूका  था पर गौना  नहीं  हुआ था . दुल्हन के  मुताल्लिक सब छेड़ते  भी  थे , वो शरमा  जाता  था . उस  रोज़  की रात  भी सीनियर  मजे  ले  गए  थे _ " तुम  चाहो  तिवारी तो रात में अपने ससुराल  तक जा  सकते हो ,दुल्हन  न दिखे  घर तो दिख ही जाएगा :) हम  चलते  हैं ,सुबह  मिलेंगे ," और दोनों चलते  बने .

                   रात  के 2  बज  गए  होंगे .हल्की -सी  सर्दी  ,जवान  अपनी  ड्यूटी पर मुस्तैद .तभी उसने  देखा एक आग  का गोला ! " अरे ! ये क्या ? " पर वो गायब ! उसे  लगा ,क्या वो सो  गया था ? कोई सपना था ? वरना ...... तभी लपट  फ़िर दिखी और गोले में तब्दील हुई ...और फ़िर  गायब ! " अरे  ,मैं तो  जगता  हूँ ,पर ये क्या था ,दूसरी बार भी गायब ,इस बार वो सतर्क  था .अब बार देखने  को उत्सुक ! लपट  फ़िर  दिखी ,उससे  दूर  जाती हुई . वो पीछे  हो लिया .पल भर को गायब फ़िर प्रकट , कौतुहल  जाग  गया ! लपट  बढ़ती  जा  रही  थी गेट  से दूर .... और तिवारी  मन्त्र -मुग्ध -सा उसके पीछे  कब  हो लिया  उसे  ख़ुद  नहीं  मालूम !

               ये  लुका -छिपी लगभग 2  घंटे   चली . 2-4  किलोमीटर  दूर  आ गया  था जवान ,अपने  गेट  से .थी  तो बस एक जिज्ञासा कि ये क्या  तमाशा  है . तभी  एक भरभरी -सी आवाज़ आई _ " लड़के  लौट जा " हं ? उसे अपने कानों  पर  यकीन न हुआ ! उसने क्या सचमुच  कुछ  सुना था ? या  उसे  धोका  हुआ ? इसी  कश्मकश  में  पीछा  जारी  था . तभी  आवाज़  फ़िर  आई -  "लौट जा ... क्या जान  देना  चाहता  है ? " b.s.f.  बहुत  पीछे  छूट  गया ,कब  बीहड़  शुरू  हो गया उसे  तो  भान  ही न था ! दोनों  पिलियाखाल  के  पुल  तक आ  गए थे . सुबह  होने  में अभी  देर  थी ,सीनियर  नींद  निकाल के आ  गए थे . गेट  पर से  जवान गायब ,उनके  तो  होश  उड़ गए ! कहाँ  गया ? इतनी  रात में ? क्या ससुराल चला गया ? दोनों उसी दिशा  में भागे . तिवारी$$$$, आवाज़  रात  को चीरती  चली  गई ,पर  जवाब  न आया .

                      दोनों  जवान  अब  घबरा  गए  थे ,लड़का  गया  तो  कहाँ  आखिर ? लालटेन और टॉर्च  का उजाला  कम  पड़  रहा  होता अगर रात शुक्ल पक्ष की न होती . पुकार  पर पुकार  - तिवारी , तिवारी किधर  हो जवा$$$$न ? जवान  होता  वहां तो जवाब  देता ! वो  तो उस आग के लुप-झुप  गोले  के पीछे  भाग रहा  था . आवाज़ का तिलिस्म  उसे विचित्र  रोमांचक  अहसास  दिला  रहा  था .जैसे  वो अपने आपे  में नहीं था . उसे मालूम  ही  न  चला  कि वो कितनी  दूर  चला   आया  है ! वो पुल से  नीचे  कुरी  के झाँखड़  तक नाले  के किनारे  पहुँच  गया  था .ऐसा  लग  रहा  था जैसे  कोई धौकनी  की तरह जब सांस  छोड़ता  है तब आग  की लपट  निकलती  है ,जब  सांस  लेता  है  तब  लपट  गायब  हो जाती  है .

                       इस  बार जब फ़िर  लौटने  को कहा  गया तो उसे कुछ अजीब लगा ! आग  ठहर  गई  थी .आवाज़  फ़िर आई - 'लौट जा ,मानता  क्यूँ  नहीं ?" तिवारी  के शरीर में  झुरझुरी  -सी  दौड़ उठी ,वो  किसके  पीछे  है ? कहाँ  आ  गया  है ? ये  तो पुल  के  नीचे का भाग  है .उसने  पूरा साहस  जुटा  के पूछा - " कौन हो  तुम ... बोलो$$$ कौन हो ?" " लड़के ,अगिया  हूँ मैं " आवाज़  नाला  पार  कर  गई  थी . जवान  होश  में आते ही बेहोश  होकर  गिर  पड़ा . दांत  बंध  गए . मुट्ठियाँ  भिंच  गई .  साथी  आ  गए  थे .उसे  हिला  रहे थे - " उठो  यार ! यहाँ  कैसे  आ  गए ? क्या  हुआ  है ? कौन  था वहां  बताने  वाला  की क्या  हुआ  था ? और  क्या  बाकी  था . तिवारी  होश  में लौट  आया था ! सवाल  पर सवाल दागे  जा रहे थे ! जवाब  होकर  भी जैसे  उसके पास  नहीं  था ! आपके  पास है ,जवाब ?   आज तन्त्र -साधकों  और औगढ विद्या वाले तथा  कुछ  हठ  योगी टाइप  के  लोग कुम्भ के  मेले  में मिल  जाएँगे ,इस  सत्य  की  पुष्टि के  लिए ! पर अब उन  लोगों  में भी पाखंड  व्याप गया  है .
           
                    मन्नू  मास्टर अतीत  से  निकल कर  बच्चों  को यही  समझा  रहे  थे - " सब  माया  हैं ,मन  का  धोका  !भूत -वूत  नहीं  होते ! न ऐताल  -बैताल , ईश्वर  सबकी  रक्षा  करे ! चलो  जावौ  अबै  आपन -आपन घरे :) "
                        
     ----------------------------- डॉ.प्रतिभा स्वाति
 

गुरुवार, दिसंबर 21, 2017

अंदाज़ अपना -अपना ....

  तृष्णा

               कोई  कहता बंगाली  है तो किसी  ने  कहा नहीं  क्रिश्चियन  है ! कुछ उसके  महाराष्ट्रियन होने का अंदाज़  लगा  रहे  थे ! किसी  ने उसे  थाने पर गाड़ी  खड़ी करते  देखा  था ,सो  बोला मुझे  लगता है पुलिस  में  है ! नहीं    ए  बी रोड पर भास्कर के ऑफिस में देखा  है मैंने कई बार पत्रकार  है  शायद ! जो  भी  हो है  बड़ी तेज़ ये  इस  "तेज " वाले  मुद्दे  पर  सब  एकमत  थे :) वो  डरावनी  तो  कतई  नहीं  थी ,पर  सब डर  रहे  थे उससे ! मुझे  स्मार्ट  लगी ! एसटीडी  पर   देखा  था उस  दिन . बात  करने  के अंदाज  से लगा  पढ़ी -लिखी  है , आवाज़  में दम  था ,उसकी  हंसी  में  गज़ब  की  खनक  महसूस  की  मैंने .

               मेरा  फ़ोन आने  वाला  था  ,ग्वालियर  से . मै  तब  इंदौर  में थी . राष्ट्रीय  हिंदी मेल जो  भोपाल  से प्रकाशित  हो रहा  था , सम्पादक  विजय दास  थे . मैं इंदौर    से  बतौर  संवाददाता  क्राइम  रिपोर्ट करती  थी . फुर्सत  कम  होती  थी  इसलिए  तृष्णा  वाले  मुआमले  में  मैंने  कोई   दिलचस्पी  नहीं  ली . 
               
                                  पात्र  का  नाम  भी  बता  दिया ,स्थान  भी ! उसकी  उम्र यही कोई 25 से  30  के  बीच होगी ( लीजिये  इस औपचारिकता  का निर्वाह स्वत: ही  हो  गया ) रही  बात  लोगों  के  अंदाज़  की  ,तो  भई  ये मानवीय  फ़ितरत  है . इसे  हम  रोक  सकते  हैं ? यदि  यह  इसी  तर्ज़  पर  चले  तो  कोई  नुकसान  नहीं  मेरे पात्र  को :) पर  यदि  यह अफ़वाह  में तब्दील  हुई तो एतराज़  लाज़िमी  है . है  ना ? फुर्सत  हो तो अंदाज़  आप भी  लगा  सकते  हैं ! पर  मै  आपको  सत्य  और पात्र के सकारात्मक पहलू  से  मिलवा  कर  जाउंगी ! यही  उद्देश्य  है ,मेरे  लिखने  का . मीनमेख  निलालना  मानवीय  प्रकृति  है , लेकिन  लेखकीय  -धर्म  उससे  उपर  है  . भला  किसी  की  ख़ामी   निकालना  कौनसी  ख़ूबी  है ? वैसे  जिज्ञासा  मानवीय  स्वभाव  है , इससे  भला  हम और आप   इनकार  कर सकते  हैं ? शायद  इसीके  वशीभूत सब "कुछ ' न जान पाने  के  कारण  तृष्णा  पर अपने अंदाजों  का लेबल  चस्पा  करने  को  बाध्य  थे :)

                 कालोनी  के  बच्चे  भी  पीछे  नहीं  थे .मीठी  -अबोध  मुखबिरी किये  जा  रहे  थे ,अनजाने  में .उनकी  माताएं  यानी  मेरी  मुंहबोली  भाभियाँ  उसमें  नमक -मिर्च  लगाकर अपनी दोपहर  का   गुज़ारा  कर  रहीं  थीं . वैसे  सभीको  किसी  चटपटी  मसालेदार  खबर का इंतज़ार  था .कालोनी  के  कुछ लुन्गाणों ने  उसका  पीछा  करना  शुरू  कर  दिया  था . इस  बात  की शिकायत करने वो  थाने  गई  थी ,याने  उसके  पुलिस  में होने  का  अंदाज़ ग़लत  था :) जब  t.i. बृजेश  से  बात  हुई  तब पता  चला :) उन्होंने  मुझपे  व्यंग्य  कसा  था - " प्रतिभा , तुम्हारे  पड़ोस  की अबला  है , थोड़ा  उसका  ध्यान  रखोना वरना तुम्हारे  2-4 भाई अंदर हो  जाएँगे " फ़िर एक  कोमल  -सी मुस्कान लाकर उन्होंने सारी  बात  बताई ! मेरे  उन तथाकथित  भाइयों  का  अंदाज़  था  कि  वो अकेली  तो  है  ही ,शायद  उसकी  शादी -वादी  नहीं  हुई ,इसलिए  उनका  स्कोप  बनता  है , ट्राय  करने  में  क्या  हर्ज़  है ! क्या  बेरोज़गार  युवा  को कोई  सही दिशा  दे  सकता  है ? क्या मनोरंजन  का  ये तरीका  है ? 

                            वैसे  मुहल्ले  के  ये  भाई मुझे  दीदी  कहते  थे . मेरे  कज़िन नज़दीक  ही  रहते  थे ,शायद  उनके  दोस्ताने  के  लिहाज़  से . अच्छे  घरों  के  अच्छे  बच्चे  थे . बस  भटक  रहे  थे या  भटक  गए थे यूँ कहिये ! अब  संस्कार  की घुट्टी  घर में कहाँ  , कौन  मां  घिसती  है ? बाज़ार में बनी बनाई  जबसे  मिलने  लगी  है ! स्कूल  में अनुशासन  का  पाठ  यूनिफार्म  की इस्त्री  पर  ही  खत्म  हो जाता  है होमवर्क पूरा होना भी इसी में शुमार कर लीजिये . क्या  मैं  ग़लत कह  रही  हूँ ?

                    उसदिन  बिट्टू  की मम्मी  ने मेरे  दरवाजे  पे दस्तक  दी ,अमूमन  मेरा  दरवाज़ा  कोई  यूँ  ही  नहीं  बजाता  मैंने  खिड़की  ही  से कहा - " भाभी  शाम  को  बात  कर  लें ? अभी  मैंने  पूजा  भी  नहीं  की , मुझे  जाना  भी  है . फ़िर  भी उनके उत्साह  में  कोई  कमी  न आई बोलीं -  "हाँ  दीदी , पर  शाम  को  कब आऊ ? मुझे आपसे अकेले  में बात  करनी  है !' मुझे  हंसी  आ गई " अच्छा तो अभी  बतादो " मैंने  दरवाज़ा  खोल  दिया .वे बोलीं - " नहीं  बैठूंगी  नहीं  ,अभी  बिट्टू के पापा ऑफिस  नही  गए पर  भेजा  उन्हीं ने है ये पूछ्के  आने  को  की  क्या  हम लोग उसके दरवाजे पे गाड़ी  नी खड़ी  कर सकते ? सड़क  उसके  बाप  की है क्या ? " उनको  गुस्सा  आ गया था ! मामले  की  नाज़ुकी  देखते  हुए ,मैंने  उन्हें  पानी  पिलाया और प्रतिप्रश्न  किया - " भाभी , गाड़ी के लिए गैरेज  है तो वहां खड़ी  कर देते ,उसके  दरवाजे  पे क्यूँ ? " वे  बोलीं " अरे  दीदी ये  ज़रा देर  को  आए थे ,खाना  खाने .उधर  छाँव  के  कारण . वो आपकी  सहेली  बोली हटाओ  यहाँ  से नी तो पुलिस  में फ़ोन  कर दूंगी " अरे ! मुझेi  भी अजीब लगा थोड़ा .मैंने  उन्हें  समझाया अभी  नई आई  है ,किसी  को जानती  नहीं . वैसे  मुझे उनके पति  की हरकत  भी नागवार  गुज़री  थी .क्या  क्या  ज़ुरूरत  थी उन्हें उलझने  की ? बात  को  हल्का  करने  के लिहाज़ से  मैंने  परिहास  किया " हम नन्द -भौजाई  सहेली  हैं ,वो  मेरी  सहेली  कैसे  हुई भला ?" मैं  तो उसे  जानती  भी  नहीं थी . " वो  भी आपकी तरह जींस - शर्ट  जो पहनती है ,तो आपकी  सहेली हुई :) अपने  जवाब पर वे जोर  से हंसी और जाने को  खड़ी  हो गई , बोलीं  शाम  को आउंगी ,अभी सब  काम पसरा  पड़ा  है ! ओह भगवान अभी शाम  की क़ुरबानी  बाकी थी ? 
  
                     नगर  सुरक्षा समिति  में  मैं  थी . कई   सुनहरी  शामें जन-सेवा  के  नाम पर  स्याह  हुआ  करती  थीं . ये  मामला  भी  निपट  ही  गया  जैसे -तैसे .पर  फ़ैसला  तृष्णा  के  पक्ष  में  था कि  कोई  भी  उसके  फ़्लैट  के सामने  गाड़ी  पार्क  नहीं  करेगा .उसका  फ़्लैट  ग्राउंड  फ्लोर  पर था .तथाकथित  भाइयों  के  हाथ से  उसके  यहाँ  ताका -झांकी  का  ये  मौका  जाता  रहा :)

                       स्टेशनरी  - शॉप  पर  उस  दिन  उससे  फ़िर नजरें  मिली .इस  बार  परस्पर  मुस्कान  का आदान - प्रदान  हुआ .वहां  भीड़  ज्यादा  थी और मैं  एक  बार इत्मिनान  से बात  करना  चाहती  थी . जिससे  मोहल्ले  का  माहौल  पूर्ववत  हो  जाए , पारिवारिक   वातावरण  था वहां !सबको  अपनी  सीमा  ज्ञात  थी सब  अपने बनाए  रिश्ते पर  कायम  थे .दूध  वाले  काका  थे ,किराने  वाले  भैया थे ! मेरी  भौजाइयाँ अपने  बच्चों  को डपट  देती  थीं _ क्या मैडम - मैडम  लगा रखते  हो  बुआ     नहीं  बोल  सकते  :) उनके  पति  मुझे  बेहिचक दीदी   बोलते  थे . पूरे  मोहल्ले  में बस  दुबे आंटी मुझे प्रतिभा  नाम से  बुलाती  थीं :)

                        उस  समय  mob  नहीं  थे ! एसटीडी  पर  पंचायत होती  थी या  फ़िर  पान  की  दुकानों  पर ! लेकिन  तृष्णा  से  मेरी  पहली  और आख़िरी  चर्चा (तफ़सील से )  अहिल्या  सेंट्रल  लायब्ररी  में  हुई ! मेरा  वहां  जाना और उसका निकलना एकसाथ  हुआ !अरे तुम ! दोनों  के  मुंह  से एकसाथ  निकला ! और  हम दोनों ऐसे  हंस  रहे थे जैसे  बरसों से एक -दूसरे  को  जानते  हों :) चलो  रीडिंग  रूम  में  बैठते  हैं  थोड़ी  देर .वहां अमूमन कोई  होता  नहीं  था ! लायब्रेरियन  रघुवंशी  सर  मेरे  पति  के घनिष्ट  मित्र  थे ज्यादा  देर बैठने  पर माधव  के  हाथ  चाय  भिजवा  देते  थे .वापसी  में उनको  बताकर  ही  आती  थी. कोई  संदेश  या  कोई  लेख -वेख  होता  तो  वे मुझे  थमा  देते  कि प्रदीप  को दे  देना ! प्रदीप ? मेरे  पति :)

                 उस  दिन भी  चाय  आई ! मैंने  माधव  से कहा एक खाली  कप  ला दो ! और  सर से पूछ  लो  कुछ  देना  तो  नहीं ? हम  दोनों इधर  से  ही  निकल  जाएँगे ,मेरा  नमस्ते बोल  देना ! हम  बातचीत  के औपचारिक  दौर से गुजर कर  आत्मीय हो  चले  थे .उसने  मेरे बारे  में  पूछताछ  की सहज -सी शुरुआत  की थी  मैंने  बता दिया . अपने  बारे में कुछ  हिचकते  हुए ,उसने  स्वयम  ही  बताया ! जो  भी था सबके  अंदाज़ से ,एकदम  अलग . दु:खद  और चौंकाने  वाला ! मै  स्तब्ध  रह  गई ,पल  भर  को !

                     तृष्णा  ने पांच साल  पहले  लव-मेरिज  की  थी .दोनों  परिवार ख़ुश  नहीं  थे इस शादी  से ! ऐसा  अधिकतर  होता रहा  है ,हमारे समाज  में . पर अब उसका पति उसके  5  साल  के बेटे  को  लेकर गायब  हो  गया है ! उसे  नहीं  मालूम  दोनों  कहाँ  है ? कहाँ -कहाँ  खोजे ? किससे  मदद  मांगे  ? क्या  करे ? पुलिस  ने  उसे  मायूस  ही  किया  था ! ससुराल  वालों  ने आहत ! मायके  वाले  किनारा  कर  ही  चुके  थे ! पीड़ा  से उसका मुख  ज़र्द  था . मैं  किंकर्तव्यमूढ़  -सी ! क्या पति  ऐसा  हो  सकता  है ?
-------------------------------- डॉ. प्रतिभा स्वाति





मंगलवार, दिसंबर 19, 2017

उजालों के पीछे

    दिनेश 

                    एक  होता  है  योगी ,दूसरा  योग -गुरु फ़िर  योग -विशेषग्य  फ़िर  योग - टीचर और  सेकेण्ड  लास्ट  में  आता  है योग  -ट्रेनर और  अंत  में  आते  हैं  वे  सब जिन्होंने योग शब्द  सुना और सलाह  बांटने  लगे :) सभी  योग  से  जुड़े  हैं बस आपस में  थोड़ा -थोड़ा  फ़र्क  है . ठीक  उसी  तरह   जिस  तरह  किसी  क्लास  में  होता  है  - मोनिटर  ...  टीचर .... लेक्चरर ..... प्रोफ़ेसर .... h.o.d  और  कुलपति :) विज्ञ  -जन  तुलना  में  श्रंखला के क्रम को उलटकर  पढ़ें , एक तरफ अवरोह और  दूसरी  तरफ अवरोह है !  

                लिखी  गई  बात  बस  गद्य  है  यही  मानिये .भाषा  शैली , भाव ,उद्देश्य ,कथानक और  कथोपकथन की  तुला  से  डर  जाती   हूँ . भले न  कहें  कहानी इसे  . संस्मरण , आत्म -कथा  या  सत्यकथा  कह  लीजिये . लेख या  नाट्य  अथवा एकांकी  की  विषयवस्तु  आपको  मिल  सकती  है . हुजूर  इसे  मेरी  डायरी  का अंश  मान  लीजिये या  फ़िर मेरी  जीवनी  में इसका  जिक्र हो सकता  है :) जो  भी हो मैं  अपने  घर  में अपने  बजट और  रूचि  के मुताबिक  कुछ पकाने  का हक  रखती  हूँ , अतिथि  को  वही  मिलेगा  जो  मेरे  पास  है ! मेरे  ब्लॉग  पर आपका  सदैव  स्वागत  है :)

             दिनेश - उम्र लगभग  35 - व्यवसाय  कारपेंटर - रहवासी इंदौर . लो  हो  गया  पात्र  परिचय ! पर  बात  उज्जैन  की  है . सेवाधाम  की . हाँ  वही  सुधीर  भाई  गोयल  का आश्रम . मैं  वहां  गई  थी एक  माह  के लिए , पर  लौट आई बीस  दिन  में और  मुझे  आग्रह  किया  जा  रहा  था  कि  6 माह  रुक  जाऊं . हाँ मुझे  मालूम  है आप  बोर  हो  रहे  हैं , सच  के ख़ुलासे  रोचक  न भी  हों सनसनीखेज  होते  हैं .

                क्या  आप यकीन  करेंगे  की दिनेश  सेवाधाम में  पागलों  के  बीच तालाबंद  कमरे में चार  माह  कैद  रहा ....  बलात ....और उसके घर वालों ने उसे मृत  मान लिया . वो जीवित था , सेवाधाम  में ? कहिये  बताऊँ  पूरा  वाकया ?


         सेवाधाम  में योग -कक्षा लेते अभी  दूसरा दिन  ही हुआ था . मुझे  लगा  दाल  में काला कुछ  ज्यादा  है ! एक  दस्ता  मेरी  निगरानी  में मुसतैद  है ,  आख़िर  क्यूँ दिनभर में  कई  बार  ये  खयाल  आया और मुझे  खुदसे  कोई  संतोषजनक  जवाब  नहीं मिला ! फ़िर जब  भी क्लास खत्म  होती पीछे से एक पर्ची मेरी तरफ फेंकी जाती ! पीछे  की कतार में अधिकांश अर्ध -विक्षिप्त पुरुष  बैठे होते  थे , मै  उनसे मन  ही मन डरती थी ,सतर्क  रखती थी ख़ुद  को . एक दिन शाम के झुटपुटे में आसन लपेटते समय मैंने चुपचाप वो कागज़ उठाकर ट्रेकसूट में  छुपा  लिया . वो  पर्ची  दिनेश  की  थी . उसने अपनी  बहन का mob no लिखा  था और साथ में ये  निवेदन किया था की मैं उसके जीवित होने और सेवाधाम में उसके  कैद होने की बात उनसे से कह दूँ . 

                                मैं देख  रही थी , सेवाधाम में  कुछ लोग कैद थे .अपनी तरफ से कई ने निकल  भागने  की नाकाम  कोशिश  की थी . एक दिन अवसर मिला तब दिनेश से  पूछा -" तुम यहाँ कैसे आए ? उसने  बताया - मैं  करपेंटर  हूँ .इंदौर में मेरे 3 बच्चे और पत्नी रोते  होंगे , किसी को नहीं मालूम मैं यहाँ के पागलखाने में बन्द हूँ . " मेरे  सवाल का जवाब उसने अब तक नहीं  दिया था . मुझे  भी  कोई  जल्दी   नहीं  थी .आश्रम के  डायरेक्टर  सुधीर  भाई गोयल और मैनेजर  प्रमोद भाई उस समय  बाहर   गए हुए थे . बाकी सदस्य सुरक्षा गार्ड उस मौके का लाभ लेने के लिए मक्कारी  मार  रहे  थे .

                 मैं  तुलसी वन तैयार  करवा  रही थी . खाली  समय में  अपना  ब्राम्हण  धर्म  निभा  रही  थी :) दिनेश  भी  खुरपी  लेकर  मजदूरों में शामिल  हो गया  था . पागलों  की  गिनती शाम  6 बजे  होती  थी .तालाबन्द करने  से पहले . अंदर  के सारे  सचमुच  के पागल  थे , आक्रामhक  किस्म  के ,जो  उसकी  पिटाई  करते  थे .कपड़े  फाड़  दिए थे . कम्बल  में खटमल  ... कमरे  में मच्छर ... अँधेरा ... पीने  को जो पानी दिया जाता  था उसमें  नींद  की दवा  मिला  दी जाती  थी . इस  यातना  ने और  भय ने एक  अच्छे  भले   कारपेंटर  को  पागल  की शक्ल  दे  दी  थी . वो  हताश  था . पर उम्मीद  उसमे  बाकी थी ,वो  पूरे  होश  में था .

                   सेवाधाम  आश्रम  में  सुधीर  भाई  गोयल  सेवा  की आड़  में जो  कुछ  कर  रहे  थे , उससे  किसी  का  भी  खून  खौल  सकता  है . जो  लोग  भुगत रहे थे , उसे  जानकर  मेरे  रोगटे  खड़े  हो  गए . रोज एक नई  कहानी मेरे  सामने  आ रही  थी . मेरा  जमीर  मुझे  ललकार  रहा  था . वहां  भला  किसे  योग  की   ज़ुरूरत  थी ?  जो  लोग  वहां  मौज़ूद  थे , सब मज़बूरी  के मारे ,जिनका  कोई आसरा  नहीं  था या  फ़िर जिन्हें   फंसा  लिया  गया  था  निपुण समाजसेवी  द्वारा . और  भी  कुछ  लोगों में  भाग निकलने  की  तड़प  थी .
  
                         दिनेश  ने बताया कि  वो  तो इंदौर  से उज्जैन अपनी बहन से राखी  बंधवाने आया  था . कुछ पुराने  दोस्त  मिल  गए तो पिला  दी . थोड़ी  ज्यादा  पी थी तो लड़खड़ाकर  गटर  में  गिर  गया .इतने  में पुलिस  की गाड़ी  गश्त  को निकली तो दोस्त  छुप  गए .  पुलिस  गई  और  दोस्त  आके  निकालते  उसके  पहले  ही  सेवाधाम  वालों  ने उसे अपनी  जीप में डाला और यहाँ  लाकर  बन्द  कर  दिया . उसका रोना   मुझे  गुस्सा  दिला  रहा  था .... वाह  गजब  का n.g.o. है !

 ------------------------- डॉ. प्रतिभा  स्वाति



 ( फ़िर  उससे  मुलाकात  नहीं  हुई ,उसे  और  संदीप  को  वहां  से  निकालने  के  लिए मुझे पुलिस  की  हेल्प  लेनी  पड़ी थी .संदीप  मेरा  अगला  पात्र )



रविवार, दिसंबर 17, 2017

पड़ोस की धूप

     सविता

          एक  बात  आज  स्पष्ट  कर  ही  दूँ , फ़िर  सोचती  हूँ  चलो  रहने  दो ,  क्या  फर्क  पड़ता  है ? पर  फ़र्क  तो  पड़ता  है :) अभी  टाइप  कर  रही  थी और  जाने  कौन -सा  बटन  अनजाने  में  दब  गया और  4-6  लाइन  गायब  हो  गई ..... सारा  शगुन  बिगड़  गया .
             
       रजिस्टर  में  लिखो  तो  सामग्री  गायब  नहीं  होती . पर ........ पर  रजिस्टर  गायब  हो  जाता  है :)  कुछ  गायब  हो तब  मूड ख़राब  हो  जाता  है . यदि  कुछ   गायब  न  हो  तब ? तब  क्या  सब  ठीक  रहेगा ? मूड तब  भी  खराब  हो  सकता  है . अभी  एक  शब्द   टाइप  नही  हो  पा  रहा  था  , मुश्किल  आई  तो  फ़िर  दिमाग  खराब . दरवाज़ा  बन्द  है  बाहर  से सविता  की  आवाज़ आ  रही  है ,मेरे  लिए  लिखना  फ़िर  मुश्किल   हो  रहा  है .   इतनी  देर  में  10  हाइकू   टाइप  हो  जाते .

         अभी  कहानी  में  पात्र  की  एंट्री  भी  नहीं  हुई .कथानक  का  आरोह  है  ये ? आरोह  ही  होगा  .चरम  इतनी  जल्दी , इतने  से में सम्भव   है  क्या ? लघुकथा  होती  तो  इतना  लिखने पर  अवरोह  भी  हो  जाता :) पर उसके  लिए  दिमाग  धारदार  होना  चाहिए  , वो  कहाँ  से  लाऊं ?  मन  तो  बच्चा  है  मेरा :) बचपन  चला  गया  तो  क्या हुआ . शायद  इसलिए  मै  बच्चो  के  मन को  बड़ी  होकर  भी  अच्छे  - से  समझ  लेती  हूँ . बड़े  लोग  मेरी  समझ  में  कम  आते  हैं .और  यदि  कोई  बुद्धिमान  हुआ  तो ,वह  तो  बिलकुल  ही  समझ  नहीं आता . सच  कहूँ तो  उनसे  मै भयभीत -सी  हो  जाती  हूँ .अब  देखिये  दो  बार "मैं" को   "मै " लिख   गई  हूँ . झुन्झलाह्ट   होती  है  ऐसे  में .टाइप  करने  की स्पीड  का  पूछिए  मत ,वही  पांच  साल  पहले  की  है .इतना  लिखने में  उकता  गई  हूँ .  अब  कल  लिखूं  तो  कैसा  रहे ? जैसे  पिछली  पोस्ट  में  पंकज  को  एडिट  क्लिक  करके  आगे   बढाती   गई  उसी  तरह  सविता  से भी   मिलवा  ही   दूंगी  .     















           वैसे  सविता  कोई  इतना  महत्वपूर्ण  चरित्र  नहीं ,जिसपर  मैं  अपना  वक्त  बर्बाद   करूँ . पर  जब  भी  दरवाज़ा  खोलती  हूँ सामने  उसके  किचन  की  खिड़की  दिखती  है और  उसी  तरफ  वो भी ....   फिल्म  के  किसी  किरदार  की  तरह . जहाँ  नायिका  कितनी   भी  गरीब  हो ,उसके  वस्त्र  और  श्रंगार  का  पूरा  ध्यान  रखा  जाता  है . वरना  आज  मध्यम  वर्गीय  महिला  कहाँ  झाड़ू - पोछा - बर्तन  करती  है ? घर  में  3-3 बच्चे, उनमें  से  एक एबनार्मल और पति .

               सवाल  यह  उठता  है  कि , जब  सोनोग्राफी  हुई  तब डॉक्टर  ने  ये  बताया  होगा  कि  ट्विन्स  हैं , दोनों  लड़के  और वे  ये  नहीं  बता  पाए कि  उनमे  से  एक  "विशेष '  है .हो सकता है   बताया  भी  हो पर  तब  एबार्शन  में  दोनों  ही से  हाथ  धोना  पड़ता . अब  बोलो  राजन ? समाज  को  लाभ  हुआ  की  हानि ? बच्चो  को  भगवान  की देन  मानती  है  सविता .मैं  मुग्ध  हो  गई  उसकी  इस  मासूमियत  पर :) बहुत  तेज  है  हमारी  सविता वाट्सअप  पर  उसका  ग्रुप  है ,हाँ ! किटी  क्लब  की  मेम्बर  भी  है :) सुबह  और  शाम  नियम  से  समय  निकालती   है  पंचायत  के  लिए . बिना  रुके  बोलती  है हाथ  की  मुद्राएँ   बनाकर , कई  बार  एक  बात  को  दो  बार भी , हो  सकता  है एक  बार  में  सामने  वाला  सुन  न  पाया  हो या  फ़िर  समझ  न  पाया  हो उस  दो  कौड़ी  की  बात  को .  उसने   मुझसे  पूछा  था  उस  दिन ---" आप क्या  करते  हो ? मैंने  कहा  ,कुछ  नहीं ." तो  फ़िर बाहर  क्यूँ  नी  आते ? मैंने  कहा  ,यूँ  ही " शायद मेरा  जवाब  रुखा  था .

            फ़िर  करवाचौथ  पर मेरे  पैर छूने  आई ,जाने  कैसे  उसे  पता  चला  कि  मैं  उससे  बड़ी  हूँ , हमारी  इस सोसायटी  में बड़ों  के  पैर  छूने  का  चलन  है . मैं  जब  छोटी  थी  तब  समाज  में  कन्या  - बहन - भांजी  के  चरण- स्पर्श  का  चलन  था :) उस  वार्ता के  रूखे  जवाब  के अफ़सोस में या एवज  के आशीर्वाद  में  मैंने  उसे साऊथ - कॉटन  का  सूट उपहार के तौर पर  दिया तो ख़ुश  हो  गई . लेकिन  इस बार फ़िर  मुझसे   चूक  हो  गई मैनें   उसे   दरवाजे  ही से  लौटा दिया  था !

           इस   जघन्य  पाप  के  प्रायश्चित  का  मौका  काफ़ी  दिन  बाद  मिला .तब ,जब  उसके  बेटे  का बर्थडे  आया ,मुझे   सामने  वाली  खिड़की   से  न्यौता  आया ---  " आपको  शाम  को  आना  है 6  बजे , मैंने  अफ़सोस   जाहिर  किया  - मैं  थोड़ा  लेट हो  जाउंगी " शाम  को  पहले  बाजार  जाकर 400  का कैरम  बोर्ड   ख़रीदा और देकर आई तब पूरा  परिवार  फ़िर  ख़ुश  हो  गया :)

            क्या  ख़ुशी  उपहार  की  मोहताज  है ?  पड़ोसी -धर्म  यूँ  निर्वाह  किया  जाता  है ? लेन- देन हर  जगह  चलता  है . होटल  में  टिप .दफ्तर  में  घूस . बॉस  को  चमचागिरी  सास  को  चापलूस  बहू  विथ  ..... पसंद  आती  है . 
             
             अभी  धुप  का एक  बड़ा -सा  टुकड़ा  कोरिडोर  पर आया  .मेरे  पड़ोस के दरवाजे पर .दरवाज़ा  बन्द  था मैं  जाकर  खड़ी  हो गई ( एक अपराधबोध  के साथ ) अंदर  चर्चा  चल रही  थी . चर्चा  नहीं  सविता का  विश्लेषण  हो  रहा  था . उसकी  सहेलियाँ  उसीकी  खिल्ली  उड़ा  रही  थी ." मुंह  पर पुताई  करके  झाइयां  छुपाती  है  मैंने  देखा उसे  सुबह .दूसरा  स्वर अरे कोहनियाँ  एकदम  काली  हो  रक्खी  हैं .पहले  वाली  फ़िर  बोली फ़टी  हुई एडियाँ और  बर्तन वाली  बाई  जैसे  हाथ ,हा -हा - हा "और  फ़टी हुई आवज़  भूल  गई ,दूसरी  ने थेगला  लगाया "

                  धूप  चली  गई ,पर  मैं  क्यूँ  गई  ऐसी  धूप में ? जहाँ  उसपार  ऐसी  सखियाँ  थीं . क्या टाइम -पास  यूँ  किया  जाता  है ? घर  में  कदम रखा  तो बेटी  किताब  पढ़  रही थी ,अपनी  धुन में ____
           इक चिड़िया  के बच्चे  चार ..
           घर  से  निकले  पंख पसार !
           पूरब से पश्चिम  को  जाएं ...
         पश्चिम से  पूरब  को  जाएं !
             घूम  लिया  है  जग  सारा ...
            अपना  घर  है सबसे  प्यारा ! 
            " अपना घर  है  सबसे  प्यारा  " मैंने  उसके  सुर में सुर  मिलाया  वो बोली चिड़िया  का घर है भी  सबसे प्यारा और आकर लिपट  गई ..... मैं  भूल गई उस निर्दोष  स्नेहिल स्पर्श से वो  निंदा  स्तुति .... सच , अपना  घर  है सबसे प्यारा :)
____________________ डॉ. प्रतिभा स्वाति




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शुक्रवार, दिसंबर 08, 2017

सवाल ....

  पंकज ---
------------------ सवाल  , पंकज  का नहीं , तमाम  उन पुरुषों का है , जो उस जैसे हैं :) समाज  से रुष्ट ! समाज  को ठेंगा  दिखाने को उद्यत  ... आतुर ... तत्पर ...
         क्या  अंतर  का खालीपन  ऐसा  होता  है ? भीतर  के  बवाल से लबरेज हो जाने की परिणिति ऐसी होती  है ? एक  सामान्य  सहज जीवन न जी पाने से उत्पन्न  कुंठा ? पीड़ा  को  ख़ुशी  में लपेटने  की  कोशिश ? यथार्थ  से आँख मींच  लेना ?   एक  दाह ....  भभकती  आग  जो  सब  कुछ  भस्म  कर देना  चाहती  है , मगर  चुपके  से ! चाहे  वह  किसी की  निर्दोष  हंसी  हो . चाहे  किसी का बहुमूल्य  वक्त .  किसी  की सद्भावना  और सहायता का  जहाँ कोई मोल नही .
       पंकज  को  जानने  वालों  की  राय  ,उनके  पक्ष  में   बिलकुल नहीं .  मतलब  हो तब  ही  कोई  मिलता  है  मज़बूरी  में . या  कोई  अनजाने  ही  उनकी  चपेट में आ  जाए तो ,हो  जाती  है  मुलाकात . 
        क्या  कोई  इतना बुरा  हो  सकता  है , कि  लोग  कतराने  की  हद  पार  कर  जाएँ  ? 63  साल  का  बन्दा अब  अकेला  है घर  में . 2017 में  पत्नी  गुजर  गई . बेटे  ने  लवमेरिज  की शायद   त्रिवेन्द्रम  में  है ,अपनी  पत्नी  और  दो  बेटियों  के साथ ! बेटी  30  के आसपास  की  है ,उसकी  शादी  3 साल पहले  हुई थी अब तो उसका  तलाक  भी  हो गया ,दिल्ली  में जॉब  कर  रही  है .और  हमारे  पात्र  पंकज  आगरा  में  लोगों  को पका  रहे  हैं !
लोगो  का  कहना  है ____  बहुत  बोलते  हैं  भई  ,अपने  आगे किसी  की सुनते  ही नही ! कोई कहता है __ इतना बड़ा  बकैत  ,यार फ़ोन  करने में डर लगता  है , चिपकू है स्याला ... सठिया  गया  है . कोई  कहता है __ अंकल झूठ बहुत बोलते ,किसी  का कहना है __ निरर्थक  वार्ता में  पारंगत हैं पंकज और अपनी लम्बी  बात के बीच में कोई बोले तो उसे गाली तक दे  डालते हैं ,भला  ये कहाँ का मैनर्स  है ?
            वैसे  लोग बोलते  तो  सच  ही है .पतले - 2 हाथ -  पैर , बाहर  निकला बड़ा - सा पेट , गंजा होता  सिर और थोड़ा   लंगड़ाती  चाल वाले वे ,जब अपने आपको  हैण्डसम  कहें , शादी - बारात में  डांस करें तब कोई कैसे   झेले ? वे खाने - पीने के शौक़ीन  हैं .
___________ मेरा पात्र इतना बुरा ? ना जी ना :) वे  खाना  अच्छा बनाते  हैं , चाय  बहुत  ही अच्छी . सुबह 4 बजे  जागते  हैं . पौधों से बहुत लगाव है और..... बस :)     
 आप  मिलना  चाहेंगे पंकज से ? नहीं ? आख़िर  क्यूँ  नहीं ? वे आपको मिल सकते हैं  वाट्सप पर और शादी डॉट कॉम पर ..... :)
------------------- ( बिना  भूमिका के अपनी  कहानी  की  शुरुआत  के लिए मुआफ़ी  चाहूंगी , पर    {सवाल  - मेरा  कथा संग्रह } पात्र  आपसे  मुखातिब  हो रहे  हैं ! हर  रोज एक नया किरदार ! और  मैं    मिल रही  हूँ सबसे .... सच में )
____________________  डॉ . प्रतिभा स्वाति  



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