मंगलवार, जुलाई 10, 2018

संस्कृत में हाइकू



fb पर  विद्वानों  की  कमी  नहीं ---------- उन्हें  ब्लॉग  तक लाने की कोशिश  

बुधवार, जून 27, 2018

क्षणिक हताशा ...

 वो  दिल  में बसे  हैं ...
लोग  कहते  खो  गए !
अश्रु हर अनमोल  है ...
मुझसे  जाया  हो गए !







      ओह ! इन्सान  जो  जीता  है  वही  लिखता  है ( जब  दिल  से  लिखा  जाता  है )  लेकिन  जब  दिमाग  से  कलम  चलती  है  तब  , वह  जो  सोचता  है  वो लिखता है . जो  वह  चाहता  है  वो  लिखता  है !

       लिखने  वाला जब अपनी अभिव्यक्ति लेखन के मार्फत सार्वजनिक  कर  देता है तब ..... पाठक  पर जो  गुज़रती  है  वह  कभी  सच  नहीं  कहता :) fb पर like और वाह -वाह के कमेन्ट  ठोके  जाते  हैं ! कोई आलोचना  करे  भी  तो  क्यूँ आख़िर ? block  होने  का रिस्क ! विवाद  होने  का  डर !

               ऐसा  कविता  के  सन्दर्भ में  होता  है . यदि  पोस्ट राजनीति या धर्म  से संदर्भित  हो , तब  मुलाहिजा  ज़रा  कम  किया  जाता  है . विवाद  से  डर  नहीं  लगता . न  ही  तब  कोई  किसी  को block   करता  है !

             जो  भी  वजह  हो पाठक  को दोनों स्थितियों  में सम्वेदनशील  होना चाहिए ! और लेखक  को हमेशा  ज़रा  सावधान :) और  दोनों  ही  को वक्त  की अहमियत को  समझने  की ज़ुरूरत  नहीं  है क्या ? पूरी  ज़िन्दगी में से आधी  सोकर  गुज़ारने  वाले  हम ... अपने  देश  को  क्या दे  रहे हैं ? और  क्या  उम्मीद  लगाए  बैठे  हैं ? ये सवाल जब जेहन में उठता  है तब हताशा  के उन क्षणों  में  मैं आध्यात्मिक हो जाती  हूँ ..... फ़िर  उर्जावान ..... फ़िर एक सकारात्मकता  मुझे नव  - सृजन  के लिए  प्रेरित  करती  है :) क्या  आपके साथ  भी ऐसा  होता  है ? क्या  यही  हैं मसर्रत और  गम  के रिश्ते ? 
__________________ डॉ .प्रतिभा स्वाति 


शनिवार, जून 23, 2018

भक्ति को मत तोलो राधे ......

 कान्ह  - कान्ह  रटते  सूर ...
कृष्ण  कुटिर -द्वार  पर !
दिव्य -दृष्टि  वरदान  में ले ...
आए  करुण  पुकार  पर !

राधिका  भी  साथ  थीं ..
अधर वक्र  मुस्कान  थी !
भाव  भक्त  का  तौलतीं ...
भक्ति  से अनजान  थीं !

और क्या  कुछ  चाहिए...
 पूछिये  प्रभु  इनसे  ज़रा !
हुए  विव्हल  कृष्ण  भी ....
मिला सूर से उत्तर खरा !

दिव्य -दृष्टि से तुमको  देखा ...
प्रभु और न कछु  चाहिए !
इस छबी पर  मर मिटा  मैं ...
वरदान  प्रभु  ले  जाइये !

तनिक  लज्जित  थीं राधिका ...
उलझा  दिया  था  प्रश्न  ने !
भक्त  मेरे ,मैं  भक्त  का ...
उर से  लगाया  कृष्ण  ने !

_________________________ डॉ . प्रतिभा  स्वाति

मंगलवार, मार्च 13, 2018

खो गया है मेरा चाँद


 लख्ते -ज़िगर 
तुझे  मालूम  नहीं 
मुझे  तेरी  फिकर 

खोया  है चाँद 
आसमां  परेशान 
तुझे ढूंढे  किधर 
__________सेदोका : डॉ . प्रतिभा स्वाति


सोमवार, फ़रवरी 05, 2018

अच्छे दिन ...



 प्रजातंत्र  के मन्त्र से  ...
जनता  है  बेहाल !
खाल पहिन के शेर की...
चालें चले श्रगाल !
----------------------------- डॉ .प्रतिभा स्वाति







गुरुवार, दिसंबर 28, 2017

साल अठरवां लागा रे



 बीतीं  बीस , सदी  इक्कसवीं ,
साल  अठरवां  लागा  रे !
खुली गहन  निद्रा  क्या  बोलो ,
इनसान सहज ही जागा  रे ?

उलटी छत पर पड़ी पतंग ,
टूटा जबसे  धागा  रे !
चिड़िया को बस दाना-दुनका , (पक्षी-गण सब भूखे -प्यासे )
मोती चुगता  कागा रे !
लो साल अठरवां लागा रे !!! 

समय सरित  का  भीषण  वेग ,
बह  गए  जाने  कितने साल !
उड़  गई कब सोने की चिड़िया ,
मेरा देश हुआ, इतना कंगाल !

लोकतंत्र में नित -नए  चोचले ,
हाय ! हमें  भरमाते  हैं !
उजले  वस्त्रों  में  नेतागण ,
सभी  कलंक  छुपाते  हैं !

रोजगार  की बाँट  जोहता ,
दर-दर युवा  भटक  रहा !
घोषणाओं  का बजे  ढिढोरा ,
जन -मानस  को  खटक रहा !

वो अच्छे दिन ,कब आएँगे ?
बन से कब लौटेंगे राम ?
इधर कुआं उधर खाई  है ,
सरहद  पर हर-दिन कोहराम !

बिना हवा के कबसे बोलो ?
ये कैसी उड़  रही  पतंग ?
चोर -चोर  मौसेरे  भाई ...
कैसे इनमें छिड़ गई जंग ?

वोट -नोट मुक्तक सब ,
चुनाव  में चुगता  कागा  रे !
बीतीं  बीस ,सदी  इक्कसवीं ,
साल अठरवां  लागा रे !

लो साल अठरवां लागा  रे !!!
_______________________ डॉ .प्रतिभा स्वाति  



मंगलवार, दिसंबर 26, 2017

किस्सा -ए- अगिया बैताल ?

  मन्नू मास्टर....
           " भूत -प्रेत  कुछ  नहीं होते ! ये  वहम  है  इनसान  का ! मन  का डर !और  यदि  होते  भी  हों तो वे  इनसान से दूर रहना  चाहते  हैं " यही  कहते  थे मन्नू  मास्टर . आज से 40  साल  पहले . पर गूगल पर तो हैं ,आज  भी - भूत -प्रेत -पिशाच -बेताल  . सर्च  कर  लीजिये,  एक स्निप शॉट  ये  है :) 
         
           

                
                  वैसे गूगल  पर और  भी तमाम  link  हैं ,जिनके  होने  का औचित्य  या उपयोगिता  पर प्रश्न  उठ  सकता  है ! लेकिन   देश  यूँ ही तमाम  विपदाओं  से घिरा  है ,इस  मामूली  बात  को इग्नोर  किया जा सकता  है ! स्निप  शॉट  देने  का  कोई  विशेष  अभिप्राय  नहीं .अब  चूँकि मैं उनकी  बात आज इतने सालों  बाद याद  कर रही  हूँ तो यूँ  ही सर्च मार दिया की  बेताल के बारे में ये साईट  क्या कहता  है :) मुझे  मास्टर  साहेब का  क़िस्सा जब  आ  ही गया तो  फ़िर उसे  आप  तक  पहुँचाने  में  कोई हर्ज़  नहीं . डायरेक्ट  टाइप  करती  हूँ आजकल ,ये  सब  कहीं  लिख नहीं  रखा इसलिए व्यवधान  ज्यादा आते  हैं .किसी  सम्पादक या आलोचक  की  नज़र  इनायत  हुई तो ,मुझे  मालूम  है फ़िर  मुझ  जैसे  कहानीकार  का क्या  हश्र होगा ! पर  हम  इतने  भी कायर  नहीं :) 

            अगर  कुछ  लिखना है तो लिखकर  ही  मन शांत  होगा ! विचार  को प्रवाह  मिलना  चाहिए ! वर्ना  मानसिकता  कुंठित  होने  का  खतरा  है :) मैं ये  रिस्क नहीं ले सकती . मनोविज्ञान  दमन  के विरोध में काफी  कुछ कहता  है . सकारात्मक  सोच को स्थान  देने  के लिए एक रिक्त का भाव अनिवार्य  है .चिन्तन  की प्रक्रिया में जिस एकांत  का अवलम्बन किया  जाता है वहां  ये अतीत  की स्मृतियाँ  बाधा  पैदा करती  हैं ,ये मेरा  अनुभव  है ! बात  मन से निकल जानी चाहिए . मुंह  से  न निकले तो लिखकर  निकाल  दीजिये :)

            मन्नू   मास्टर  का हिंदी ,संस्कृत , अंग्रेज़ी , उर्दू पर  वर्चस्व  था .उम्र  होगी  कोई  70  के आसपास . उनके  7  सन्तान  थी . चार बेटियाँ  और  3 बेटे . सभी  पढ़े -लिखे और अच्छे  पदों  पर ,उस समय  ये  सब  नामुमकिन  था ! बड़ा  बेटा सेल टैक्स ऑफिसर  था . मंझला  इंदौर  के  सेकसरिया  कोलिज का जेम्स बांड ( वो ,वहां  प्रोफेसर था ) तीसरा  एग्रो -इंजीनियर . एक बेटी गोल्ड  मेडलिस्ट थी ( है ) दूसरी  डबल m.a. ( है ) तीसरी  ने  भी pg  किया  था , वो  भी  है :) पर  अब मन्नू  मास्टर  नहीं  हैं ! उनका  स्वर्गवास  हुए ,एक अर्सा  हुआ ! उनकी  कही  कहानियाँ  - किस्से - लतीफ़े  मुझे  ऐसे  याद  हैं  ,जैसे  अभी  सुने  हों ! 

                   लेकिन आज से  लगभग 40 पहले उन्होंने  सुनाया  था " अगिया  - बैताल  का किस्सा जो  मुझे  याद है ! एक आग  का गोला उनके  पास  से   गुज़रा  था ! वो उस समय  किशोर  ही थे ! BSF में एक जवान  की हैसियत  से उन्हें  भर्ती  किया  गया  था . वे  नाईट  शिफ्ट  में  अकेले  तैनात  थे .




               हम  सबने अब तक चंदामामा ,जो एक समय की लोकप्रिय  बाल -मैगज़ीन  थी ,उसमें विक्रम और वेताल  को  पढ़ा  है , टीवी  पर देखा  है.,,बस . पर, वो थे क्या ? इतिहास  गवाह  है - विक्रम  थे ! पर  बैताल  आज  भी  इतिहास  का  हिस्सा  बन  सका ? नहीं ! इतिहास  कोई  गल्प  नहीं . ये  किस्से  यूँ  ही एकदम  खत्म  न होंगे ! सदी  लग  जाएगी . 


              
             इंदौर  का  एरोड्रम  वाला  इलाका कई  सालों  तक ,कई  किलोमीटर  सुनसान  पड़ा  रहा था . दिन  में  भी लोग उधर  जाने से कतराते  थे . पिलियाखाल  का पुल शहर  की सीमा  समझी  जाती  थी .अब तो पचासों  कालोनी  कट  गई सैकड़ों  इमारतें  बन  गई और लाखों लोगों  की  बस्ती  हो  गई . सब  जंगल  गायब . तो अब वो भूत -प्रेत  भी भाग  गए  होंगे ? पहले न वहां  ढंग  की सड़क  थी न रात  में लाईट की व्यवस्था . आवागमन  के लिए वाहन  का उपलब्ध  होना तो सम्भव  ही  नहीं  था . तब  वहां  भय  के भूत  घूमते  थे ,लोगों  को डर  लगता  था . 

              एरोड्रम  के  जस्ट पहले आता  है b.s.f . जहाँ  मास्टर  साहेब  ड्यूटी पर थे . रात में दो साथी और  थे . उनसे  वरिष्ठ  थे .उम्र और ओहदे दोनों में . हमारे  मास्टर साहेब की कम उम्री और बहादुरी  का टेस्ट  लिया जाना था या  रेगिंग  ली जा रही थी या मज़ाक  की आड़ में दोनों अपनी  मक्कारी  को पनाह दे  रहे थे ? " अच्छा बच्चा  क्या  रात में बिना  डरे तुम अकेले  गेट पर ड्यूटी  दे  सकते हो ? " ये सवाल था ? परिहास था ? या चुनौती ? "जवान डरते  नही , डर उनसे डरता  है " जीवन  के  संघर्ष ने  जवान  को  निर्भीक  बना  दिया  था .बटालियन  का  सबसे  छोटा  सदस्य  था . विनम्र  भी .सबका लाड़ला  भी .सभी  जानते  थे उसके परिवार में सिवा  ताऊ  के  कोई  नहीं . उसका ब्याह  हो चूका  था पर गौना  नहीं  हुआ था . दुल्हन के  मुताल्लिक सब छेड़ते  भी  थे , वो शरमा  जाता  था . उस  रोज़  की रात  भी सीनियर  मजे  ले  गए  थे _ " तुम  चाहो  तिवारी तो रात में अपने ससुराल  तक जा  सकते हो ,दुल्हन  न दिखे  घर तो दिख ही जाएगा :) हम  चलते  हैं ,सुबह  मिलेंगे ," और दोनों चलते  बने .

                   रात  के 2  बज  गए  होंगे .हल्की -सी  सर्दी  ,जवान  अपनी  ड्यूटी पर मुस्तैद .तभी उसने  देखा एक आग  का गोला ! " अरे ! ये क्या ? " पर वो गायब ! उसे  लगा ,क्या वो सो  गया था ? कोई सपना था ? वरना ...... तभी लपट  फ़िर दिखी और गोले में तब्दील हुई ...और फ़िर  गायब ! " अरे  ,मैं तो  जगता  हूँ ,पर ये क्या था ,दूसरी बार भी गायब ,इस बार वो सतर्क  था .अब बार देखने  को उत्सुक ! लपट  फ़िर  दिखी ,उससे  दूर  जाती हुई . वो पीछे  हो लिया .पल भर को गायब फ़िर प्रकट , कौतुहल  जाग  गया ! लपट  बढ़ती  जा  रही  थी गेट  से दूर .... और तिवारी  मन्त्र -मुग्ध -सा उसके पीछे  कब  हो लिया  उसे  ख़ुद  नहीं  मालूम !

               ये  लुका -छिपी लगभग 2  घंटे   चली . 2-4  किलोमीटर  दूर  आ गया  था जवान ,अपने  गेट  से .थी  तो बस एक जिज्ञासा कि ये क्या  तमाशा  है . तभी  एक भरभरी -सी आवाज़ आई _ " लड़के  लौट जा " हं ? उसे अपने कानों  पर  यकीन न हुआ ! उसने क्या सचमुच  कुछ  सुना था ? या  उसे  धोका  हुआ ? इसी  कश्मकश  में  पीछा  जारी  था . तभी  आवाज़  फ़िर  आई -  "लौट जा ... क्या जान  देना  चाहता  है ? " b.s.f.  बहुत  पीछे  छूट  गया ,कब  बीहड़  शुरू  हो गया उसे  तो  भान  ही न था ! दोनों  पिलियाखाल  के  पुल  तक आ  गए थे . सुबह  होने  में अभी  देर  थी ,सीनियर  नींद  निकाल के आ  गए थे . गेट  पर से  जवान गायब ,उनके  तो  होश  उड़ गए ! कहाँ  गया ? इतनी  रात में ? क्या ससुराल चला गया ? दोनों उसी दिशा  में भागे . तिवारी$$$$, आवाज़  रात  को चीरती  चली  गई ,पर  जवाब  न आया .

                      दोनों  जवान  अब  घबरा  गए  थे ,लड़का  गया  तो  कहाँ  आखिर ? लालटेन और टॉर्च  का उजाला  कम  पड़  रहा  होता अगर रात शुक्ल पक्ष की न होती . पुकार  पर पुकार  - तिवारी , तिवारी किधर  हो जवा$$$$न ? जवान  होता  वहां तो जवाब  देता ! वो  तो उस आग के लुप-झुप  गोले  के पीछे  भाग रहा  था . आवाज़ का तिलिस्म  उसे विचित्र  रोमांचक  अहसास  दिला  रहा  था .जैसे  वो अपने आपे  में नहीं था . उसे मालूम  ही  न  चला  कि वो कितनी  दूर  चला   आया  है ! वो पुल से  नीचे  कुरी  के झाँखड़  तक नाले  के किनारे  पहुँच  गया  था .ऐसा  लग  रहा  था जैसे  कोई धौकनी  की तरह जब सांस  छोड़ता  है तब आग  की लपट  निकलती  है ,जब  सांस  लेता  है  तब  लपट  गायब  हो जाती  है .

                       इस  बार जब फ़िर  लौटने  को कहा  गया तो उसे कुछ अजीब लगा ! आग  ठहर  गई  थी .आवाज़  फ़िर आई - 'लौट जा ,मानता  क्यूँ  नहीं ?" तिवारी  के शरीर में  झुरझुरी  -सी  दौड़ उठी ,वो  किसके  पीछे  है ? कहाँ  आ  गया  है ? ये  तो पुल  के  नीचे का भाग  है .उसने  पूरा साहस  जुटा  के पूछा - " कौन हो  तुम ... बोलो$$$ कौन हो ?" " लड़के ,अगिया  हूँ मैं " आवाज़  नाला  पार  कर  गई  थी . जवान  होश  में आते ही बेहोश  होकर  गिर  पड़ा . दांत  बंध  गए . मुट्ठियाँ  भिंच  गई .  साथी  आ  गए  थे .उसे  हिला  रहे थे - " उठो  यार ! यहाँ  कैसे  आ  गए ? क्या  हुआ  है ? कौन  था वहां  बताने  वाला  की क्या  हुआ  था ? और  क्या  बाकी  था . तिवारी  होश  में लौट  आया था ! सवाल  पर सवाल दागे  जा रहे थे ! जवाब  होकर  भी जैसे  उसके पास  नहीं  था ! आपके  पास है ,जवाब ?   आज तन्त्र -साधकों  और औगढ विद्या वाले तथा  कुछ  हठ  योगी टाइप  के  लोग कुम्भ के  मेले  में मिल  जाएँगे ,इस  सत्य  की  पुष्टि के  लिए ! पर अब उन  लोगों  में भी पाखंड  व्याप गया  है .
           
                    मन्नू  मास्टर अतीत  से  निकल कर  बच्चों  को यही  समझा  रहे  थे - " सब  माया  हैं ,मन  का  धोका  !भूत -वूत  नहीं  होते ! न ऐताल  -बैताल , ईश्वर  सबकी  रक्षा  करे ! चलो  जावौ  अबै  आपन -आपन घरे :) "
                        
     ----------------------------- डॉ.प्रतिभा स्वाति
 

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