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मंगलवार, सितंबर 12, 2017

मुद्राएँ ......


हमारा  शरीर  पंच - तत्वों से  बना है  ---------



हाथ की अंगुलियाँ  और अंगूठा इन पंच -तत्वों का ख़ुलासा  करते हैं  :)




  अंगुली और अंगूठे से मिलकर  बनाई  जाती  है योग और नृत्य  में -- "मुद्राएँ " 















गुरुवार, नवंबर 03, 2016

शुक्रवार, नवंबर 06, 2015

: भद्रासन

my e-book: भद्रासन:
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  योग में ध्यानात्मक आसनों की अहमियत ,अपेक्षाकृत अधिक है ---- पद्मासन को उच्च तथा वज्रासन , भद्रासन को मध्यम , स्वस्तिक आसन या अन्य स...

शनिवार, अगस्त 15, 2015

नि: शुल्क योग शिविर , आगरा में :)


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 1  सितम्बर तक / आप सम्पर्क कर सकते हैं :)
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मंगलवार, दिसंबर 09, 2014

ध्यान / maditation



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हिन्दू धर्म के सन्दर्भ में ध्यान महर्षि पतंजलि द्वारा विरचित योगसूत्र में वर्णित अष्टांगयोग का एक अंग है। ये आठ अंग हैं - यम, नियम, आसन,प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, तथा समाधि।
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ध्यान एक क्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने मन को चेतना की एक विशेष अवस्था में लाने का प्रयत्न करता है। ध्यान का उद्देश्य कोई लाभ प्राप्त करना हो सकता है या ध्यान करना अपने-आप में एक लक्ष्य हो सकता है। 'ध्यान' से अनेकों प्रकार की क्रियाओं का बोध होता है। इसमें मन को विशान्ति देने की सरल तकनीक से लेकर आन्तरिक ऊर्जा या जीवन-शक्ति (की, प्राण आदि) का निर्माण तथा करुणा, प्रेम, धैर्य, उदारता, क्षमा आदि गुणों का विकास आदि सब समाहित हैं।


अलग-अलग सन्दर्भों में 'ध्यान' के अलग-अलग अर्थ हैं। ध्यान का प्रयोग विभिन्न धार्मिक क्रियाओं के रूप में अनादि काल से किया जाता रहा है।
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महर्षि पतंजलि के योगसूत्र में ध्यान भी एक सोपान है।
चित्त को एकाग्र करके किसी एक वस्तु पर केन्द्रित कर देना ध्यान कहलाता है। प्राचीन काल में ऋषि मुनि भगवान का ध्यान करते थे। ध्यान की अवस्था में ध्यान करने वाला अपने आसपास के वातावरण को तथा स्वयं को भी भूल जाता है। ध्यान करने से आत्मिक तथा मानसिक शक्तियों का विकास होता है। जिस वस्तु को चित मे बांधा जाता है उस मे इस प्रकार से लगा दें कि बाह्य प्रभाव होने पर भी वह वहाँ से अन्यत्र न हट सके, उसे ध्यान कहते है।

ध्यान से लाभ[संपादित करें]

ऐसा पाया गया है कि ध्यान से बहुत से मेडिकल एवं मनोवैज्ञानिक लाभ होते हैं।
बेहतर स्वास्थ्य
  • शरीर की रोग-प्रतिरोधी शक्ति में वृद्धि
  • रक्तचाप में कमी
  • तनाव में कमी
  • स्मृति-क्षय में कमी (स्मरण शक्ति में वृद्धि)
  • वृद्ध होने की गति में कमी
उत्पादकता में वृद्धि
  • मन शान्त होने पर उत्पादक शक्ति बढती है; लेखन आदि रचनात्मक कार्यों में यह विशेष रूप से लागू होता है।


    आत्मज्ञान की प्राप्ति
    • ध्यान से हमे अपने जीवन का उद्देश्य समझने में सहायता मिलती है। इसी तरह किसी कार्य का उद्देश्य एवं महत्ता का सही ज्ञान हो पाता है।
    छोटी-छोटी बातें परेशान नहीं करतीं
    • मन की यही प्रकृति (आदत) है कि वह छोटी-छोटी अर्थहीन बातों को बडा करके गंभीर समस्यायों के रूप में बदल देता है। ध्यान से हम अर्थहीन बातों की समझ बढ जाती है; उनकी चिन्ता करना छोड देते हैं; सदा बडी तस्वीर देखने के अभ्यस्त हो जाते हैं।

    चिंता से छुटकारा[संपादित करें]

    वैज्ञनिकों के अनुसार ध्यान से व्यग्रता का ३९ प्रतिशत तक नाश होता है और मस्तिष्क की कार्य क्षमता बढ़ती है। बौद्ध धर्म में इसका उल्लेख पहले से ही मिलता है।[1]
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    ---------------------------------------------- प्रस्तुति : डॉ. प्रतिभा स्वाति



    शनिवार, दिसंबर 06, 2014

    प्राणायाम (1)



    ________________ अनुलोम विलोम प्राणायाम


                                                          ---------------------------------- प्रस्तुति : डॉ. प्रतिभा स्वाति

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    सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन में बैठें। शुरुवात और अन्त भी हमेशा बाये नथुने (नोस्टील) से ही करनी है, नाक का दाया नथुना बंद करें व बाये से लंबी सांस लें, फिर बाये को बंद करके, दाया वाले से लंबी सांस छोडें...अब दाया से लंबी सांस लें व बाये वाले से छोडें...याने यह दाया-दाया बाया-बाया यह क्रम रखना, यह प्रक्रिया १०-१५ मिनट तक दुहराएं| सास लेते समय अपना ध्यान दोनो आँखो के बीच मे स्थित आज्ञा चक्र पर ध्यान एकत्रित करना चाहिए| और मन ही मन मे सांस लेते समय ओउम-ओउम का जाप करते रहना चाहिए|हमारे शरीर की ७२,७२,१०,२१० सुक्ष्मादी सुक्ष्म नाडी शुद्ध हो जाती है| बायी नाडी को चन्द्र (इडा, गन्गा) नाडी, और बायी नाडी को सुर्य (पीन्गला, यमुना) नाडी केहते है| चन्द्र नाडी से थण्डी हवा अन्दर जती है और सुर्य नाडी से गरम नाडी हवा अन्दर जती है|थण्डी और गरम हवा के उपयोग से हमारे शरीर का तापमान संतुलित रेहता है| इससे हमारी रोग-प्रतिकारक शक्ती बढ जाती है|


      सुखासन, सिद्धासन, पद्मासन, वज्रासन में बैठें। शुरुवात और अन्त भी हमेशा बाये नथुने (नोस्टील) से ही करनी है, नाक का दाया नथुना बंद करें व बाये से लंबी सांस लें, फिर बाये को बंद करके, दाया वाले से लंबी सांस छोडें...अब दाया से लंबी सांस लें व बाये वाले से छोडें...याने यह दाया-दाया बाया-बाया यह क्रम रखना, यह प्रक्रिया १०-१५ मिनट तक दुहराएं| सास लेते समय अपना ध्यान दोनो आँखो के बीच मे स्थित आज्ञा चक्र पर ध्यान एकत्रित करना चाहिए| और मन ही मन मे सांस लेते समय ओउम-ओउम का जाप करते रहना चाहिए|हमारे शरीर की ७२,७२,१०,२१० सुक्ष्मादी सुक्ष्म नाडी शुद्ध हो जाती है| बायी नाडी को चन्द्र (इडा, गन्गा) नाडी, और दायी नाडी को सुर्य (पीन्गला, यमुना) नाडी केहते है| चन्द्र नाडी से थण्डी हवा अन्दर जती है और सुर्य नाडी से गरम नाडी हवा अन्दर जती है|थण्डी और गरम हवा के उपयोग से हमारे शरीर का तापमान संतुलित रेहता है| इससे हमारी रोग-प्रतिकारक शक्ती बढ जाती है.

      • हमारे शरीर की ७२,७२,१०,२१० सुक्ष्मादी सुक्ष्म नाडी शुद्ध हो जाती है|
      • हार्ट की ब्लाँकेज खुल जाते है|
      • हाय, लो दोन्हो रक्त चाप ठिक हो जायेंगे|
      • आर्थराटीस, रोमेटोर आर्थराटीस, कार्टीलेज घीसना ऐसी बीमारीओंको ठीक हो जाती है|
      • टेढे लीगामेंटस सीधे हो जायेंगे|
      • व्हेरीकोज व्हेनस ठीक हो जाती है|
      • कोलेस्टाँल, टाँक्सीनस, आँस्कीडण्टस इसके जैसे विजतीय पदार्थ शरीर के बहार नीकल जाते है|
      • सायकीक पेंशनट्स को फायदा होता है|
      • कीडनी नँचरली स्वछ होती है, डायलेसीस करने की जरुरत नही पडती|
      • सबसे बडा खतरनाक कँन्सर तक ठीक हो जाता है|
      • सभी प्रकारकी अँलार्जीयाँ मीट जाती है|
      • मेमरी बढाने की लीये|
      • सर्दी, खाँसी, नाक, गला ठीक हो जाता है|
      • ब्रेन ट्युमर भी ठीक हो जाता है|
      • सभी प्रकार के चर्म समस्या मीट जाती है|
      • मस्तिषक के सम्बधित सभि व्याधिओको मीटा ने के लिये|
      • पर्किनसन, प्यारालेसिस, लुलापन इत्यादी स्नयुओ के सम्बधित सभि व्याधिओको मीटा ने के लिये|
      • सायनस की व्याधि मीट जाती है|
      • डायबीटीस पुरी तरह मीट जाती है|
      • टाँन्सीलस की व्याधि मीट जाती है.
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