बुधवार, अक्तूबर 17, 2018

समय के साथ .....

 चल  रहा  है 
सतत 
मोह -माया से 
विरत 

पीछे  न देखा 
मुड़कर  कभी 
देखा  नहीं 
जुड़कर  कभी 

तुम  अमर 
नश्वर  सभी 
श्राप या वर 
सोचा  कभी ?

बलवान तुम 
कमज़ोर  जग 
चलते सतत 
थकते न पग ?

कर लिया 
इतना सफ़र 
मंज़िल  नहीं 
कोई मगर 

दिखते  नहीं 
रुकते  नहीं 
तुम कौन हो ?
क्यूँ मौन हो ?

किस श्राप से 
चल रहे  हो ?
 कौनसा  वर ?
अटल रहे  हो 

सुनकर मुझे 
क्यूँ हंस रहे हो ?
मेरे समक्ष 
विवश  रहे हो 

गति में ,समय 
तुमसे  बड़ी  हूँ 
मैं ध्वनि  हूँ 
आगे  खड़ी  हूँ :)
______________ डॉ .प्रतिभा स्वाति

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