मंगलवार, दिसंबर 19, 2017

उजालों के पीछे

    दिनेश 

                    एक  होता  है  योगी ,दूसरा  योग -गुरु फ़िर  योग -विशेषग्य  फ़िर  योग - टीचर और  सेकेण्ड  लास्ट  में  आता  है योग  -ट्रेनर और  अंत  में  आते  हैं  वे  सब जिन्होंने योग शब्द  सुना और सलाह  बांटने  लगे :) सभी  योग  से  जुड़े  हैं बस आपस में  थोड़ा -थोड़ा  फ़र्क  है . ठीक  उसी  तरह   जिस  तरह  किसी  क्लास  में  होता  है  - मोनिटर  ...  टीचर .... लेक्चरर ..... प्रोफ़ेसर .... h.o.d  और  कुलपति :) विज्ञ  -जन  तुलना  में  श्रंखला के क्रम को उलटकर  पढ़ें , एक तरफ अवरोह और  दूसरी  तरफ अवरोह है !  

                लिखी  गई  बात  बस  गद्य  है  यही  मानिये .भाषा  शैली , भाव ,उद्देश्य ,कथानक और  कथोपकथन की  तुला  से  डर  जाती   हूँ . भले न  कहें  कहानी इसे  . संस्मरण , आत्म -कथा  या  सत्यकथा  कह  लीजिये . लेख या  नाट्य  अथवा एकांकी  की  विषयवस्तु  आपको  मिल  सकती  है . हुजूर  इसे  मेरी  डायरी  का अंश  मान  लीजिये या  फ़िर मेरी  जीवनी  में इसका  जिक्र हो सकता  है :) जो  भी हो मैं  अपने  घर  में अपने  बजट और  रूचि  के मुताबिक  कुछ पकाने  का हक  रखती  हूँ , अतिथि  को  वही  मिलेगा  जो  मेरे  पास  है ! मेरे  ब्लॉग  पर आपका  सदैव  स्वागत  है :)

             दिनेश - उम्र लगभग  35 - व्यवसाय  कारपेंटर - रहवासी इंदौर . लो  हो  गया  पात्र  परिचय ! पर  बात  उज्जैन  की  है . सेवाधाम  की . हाँ  वही  सुधीर  भाई  गोयल  का आश्रम . मैं  वहां  गई  थी एक  माह  के लिए , पर  लौट आई बीस  दिन  में और  मुझे  आग्रह  किया  जा  रहा  था  कि  6 माह  रुक  जाऊं . हाँ मुझे  मालूम  है आप  बोर  हो  रहे  हैं , सच  के ख़ुलासे  रोचक  न भी  हों सनसनीखेज  होते  हैं .

                क्या  आप यकीन  करेंगे  की दिनेश  सेवाधाम में  पागलों  के  बीच तालाबंद  कमरे में चार  माह  कैद  रहा ....  बलात ....और उसके घर वालों ने उसे मृत  मान लिया . वो जीवित था , सेवाधाम  में ? कहिये  बताऊँ  पूरा  वाकया ?


         सेवाधाम  में योग -कक्षा लेते अभी  दूसरा दिन  ही हुआ था . मुझे  लगा  दाल  में काला कुछ  ज्यादा  है ! एक  दस्ता  मेरी  निगरानी  में मुसतैद  है ,  आख़िर  क्यूँ दिनभर में  कई  बार  ये  खयाल  आया और मुझे  खुदसे  कोई  संतोषजनक  जवाब  नहीं मिला ! फ़िर जब  भी क्लास खत्म  होती पीछे से एक पर्ची मेरी तरफ फेंकी जाती ! पीछे  की कतार में अधिकांश अर्ध -विक्षिप्त पुरुष  बैठे होते  थे , मै  उनसे मन  ही मन डरती थी ,सतर्क  रखती थी ख़ुद  को . एक दिन शाम के झुटपुटे में आसन लपेटते समय मैंने चुपचाप वो कागज़ उठाकर ट्रेकसूट में  छुपा  लिया . वो  पर्ची  दिनेश  की  थी . उसने अपनी  बहन का mob no लिखा  था और साथ में ये  निवेदन किया था की मैं उसके जीवित होने और सेवाधाम में उसके  कैद होने की बात उनसे से कह दूँ . 

                                मैं देख  रही थी , सेवाधाम में  कुछ लोग कैद थे .अपनी तरफ से कई ने निकल  भागने  की नाकाम  कोशिश  की थी . एक दिन अवसर मिला तब दिनेश से  पूछा -" तुम यहाँ कैसे आए ? उसने  बताया - मैं  करपेंटर  हूँ .इंदौर में मेरे 3 बच्चे और पत्नी रोते  होंगे , किसी को नहीं मालूम मैं यहाँ के पागलखाने में बन्द हूँ . " मेरे  सवाल का जवाब उसने अब तक नहीं  दिया था . मुझे  भी  कोई  जल्दी   नहीं  थी .आश्रम के  डायरेक्टर  सुधीर  भाई गोयल और मैनेजर  प्रमोद भाई उस समय  बाहर   गए हुए थे . बाकी सदस्य सुरक्षा गार्ड उस मौके का लाभ लेने के लिए मक्कारी  मार  रहे  थे .

                 मैं  तुलसी वन तैयार  करवा  रही थी . खाली  समय में  अपना  ब्राम्हण  धर्म  निभा  रही  थी :) दिनेश  भी  खुरपी  लेकर  मजदूरों में शामिल  हो गया  था . पागलों  की  गिनती शाम  6 बजे  होती  थी .तालाबन्द करने  से पहले . अंदर  के सारे  सचमुच  के पागल  थे , आक्रामhक  किस्म  के ,जो  उसकी  पिटाई  करते  थे .कपड़े  फाड़  दिए थे . कम्बल  में खटमल  ... कमरे  में मच्छर ... अँधेरा ... पीने  को जो पानी दिया जाता  था उसमें  नींद  की दवा  मिला  दी जाती  थी . इस  यातना  ने और  भय ने एक  अच्छे  भले   कारपेंटर  को  पागल  की शक्ल  दे  दी  थी . वो  हताश  था . पर उम्मीद  उसमे  बाकी थी ,वो  पूरे  होश  में था .

                   सेवाधाम  आश्रम  में  सुधीर  भाई  गोयल  सेवा  की आड़  में जो  कुछ  कर  रहे  थे , उससे  किसी  का  भी  खून  खौल  सकता  है . जो  लोग  भुगत रहे थे , उसे  जानकर  मेरे  रोगटे  खड़े  हो  गए . रोज एक नई  कहानी मेरे  सामने  आ रही  थी . मेरा  जमीर  मुझे  ललकार  रहा  था . वहां  भला  किसे  योग  की   ज़ुरूरत  थी ?  जो  लोग  वहां  मौज़ूद  थे , सब मज़बूरी  के मारे ,जिनका  कोई आसरा  नहीं  था या  फ़िर जिन्हें   फंसा  लिया  गया  था  निपुण समाजसेवी  द्वारा . और  भी  कुछ  लोगों में  भाग निकलने  की  तड़प  थी .
  
                         दिनेश  ने बताया कि  वो  तो इंदौर  से उज्जैन अपनी बहन से राखी  बंधवाने आया  था . कुछ पुराने  दोस्त  मिल  गए तो पिला  दी . थोड़ी  ज्यादा  पी थी तो लड़खड़ाकर  गटर  में  गिर  गया .इतने  में पुलिस  की गाड़ी  गश्त  को निकली तो दोस्त  छुप  गए .  पुलिस  गई  और  दोस्त  आके  निकालते  उसके  पहले  ही  सेवाधाम  वालों  ने उसे अपनी  जीप में डाला और यहाँ  लाकर  बन्द  कर  दिया . उसका रोना   मुझे  गुस्सा  दिला  रहा  था .... वाह  गजब  का n.g.o. है !

 ------------------------- डॉ. प्रतिभा  स्वाति



 ( फ़िर  उससे  मुलाकात  नहीं  हुई ,उसे  और  संदीप  को  वहां  से  निकालने  के  लिए मुझे पुलिस  की  हेल्प  लेनी  पड़ी थी .संदीप  मेरा  अगला  पात्र )



रविवार, दिसंबर 17, 2017

पड़ोस की धूप

     सविता

          एक  बात  आज  स्पष्ट  कर  ही  दूँ , फ़िर  सोचती  हूँ  चलो  रहने  दो ,  क्या  फर्क  पड़ता  है ? पर  फ़र्क  तो  पड़ता  है :) अभी  टाइप  कर  रही  थी और  जाने  कौन -सा  बटन  अनजाने  में  दब  गया और  4-6  लाइन  गायब  हो  गई ..... सारा  शगुन  बिगड़  गया .
             
       रजिस्टर  में  लिखो  तो  सामग्री  गायब  नहीं  होती . पर ........ पर  रजिस्टर  गायब  हो  जाता  है :)  कुछ  गायब  हो तब  मूड ख़राब  हो  जाता  है . यदि  कुछ   गायब  न  हो  तब ? तब  क्या  सब  ठीक  रहेगा ? मूड तब  भी  खराब  हो  सकता  है . अभी  एक  शब्द   टाइप  नही  हो  पा  रहा  था  , मुश्किल  आई  तो  फ़िर  दिमाग  खराब . दरवाज़ा  बन्द  है  बाहर  से सविता  की  आवाज़ आ  रही  है ,मेरे  लिए  लिखना  फ़िर  मुश्किल   हो  रहा  है .   इतनी  देर  में  10  हाइकू   टाइप  हो  जाते .

         अभी  कहानी  में  पात्र  की  एंट्री  भी  नहीं  हुई .कथानक  का  आरोह  है  ये ? आरोह  ही  होगा  .चरम  इतनी  जल्दी , इतने  से में सम्भव   है  क्या ? लघुकथा  होती  तो  इतना  लिखने पर  अवरोह  भी  हो  जाता :) पर उसके  लिए  दिमाग  धारदार  होना  चाहिए  , वो  कहाँ  से  लाऊं ?  मन  तो  बच्चा  है  मेरा :) बचपन  चला  गया  तो  क्या हुआ . शायद  इसलिए  मै  बच्चो  के  मन को  बड़ी  होकर  भी  अच्छे  - से  समझ  लेती  हूँ . बड़े  लोग  मेरी  समझ  में  कम  आते  हैं .और  यदि  कोई  बुद्धिमान  हुआ  तो ,वह  तो  बिलकुल  ही  समझ  नहीं आता . सच  कहूँ तो  उनसे  मै भयभीत -सी  हो  जाती  हूँ .अब  देखिये  दो  बार "मैं" को   "मै " लिख   गई  हूँ . झुन्झलाह्ट   होती  है  ऐसे  में .टाइप  करने  की स्पीड  का  पूछिए  मत ,वही  पांच  साल  पहले  की  है .इतना  लिखने में  उकता  गई  हूँ .  अब  कल  लिखूं  तो  कैसा  रहे ? जैसे  पिछली  पोस्ट  में  पंकज  को  एडिट  क्लिक  करके  आगे   बढाती   गई  उसी  तरह  सविता  से भी   मिलवा  ही   दूंगी  .     















           वैसे  सविता  कोई  इतना  महत्वपूर्ण  चरित्र  नहीं ,जिसपर  मैं  अपना  वक्त  बर्बाद   करूँ . पर  जब  भी  दरवाज़ा  खोलती  हूँ सामने  उसके  किचन  की  खिड़की  दिखती  है और  उसी  तरफ  वो भी ....   फिल्म  के  किसी  किरदार  की  तरह . जहाँ  नायिका  कितनी   भी  गरीब  हो ,उसके  वस्त्र  और  श्रंगार  का  पूरा  ध्यान  रखा  जाता  है . वरना  आज  मध्यम  वर्गीय  महिला  कहाँ  झाड़ू - पोछा - बर्तन  करती  है ? घर  में  3-3 बच्चे, उनमें  से  एक एबनार्मल और पति .

               सवाल  यह  उठता  है  कि , जब  सोनोग्राफी  हुई  तब डॉक्टर  ने  ये  बताया  होगा  कि  ट्विन्स  हैं , दोनों  लड़के  और वे  ये  नहीं  बता  पाए कि  उनमे  से  एक  "विशेष '  है .हो सकता है   बताया  भी  हो पर  तब  एबार्शन  में  दोनों  ही से  हाथ  धोना  पड़ता . अब  बोलो  राजन ? समाज  को  लाभ  हुआ  की  हानि ? बच्चो  को  भगवान  की देन  मानती  है  सविता .मैं  मुग्ध  हो  गई  उसकी  इस  मासूमियत  पर :) बहुत  तेज  है  हमारी  सविता वाट्सअप  पर  उसका  ग्रुप  है ,हाँ ! किटी  क्लब  की  मेम्बर  भी  है :) सुबह  और  शाम  नियम  से  समय  निकालती   है  पंचायत  के  लिए . बिना  रुके  बोलती  है हाथ  की  मुद्राएँ   बनाकर , कई  बार  एक  बात  को  दो  बार भी , हो  सकता  है एक  बार  में  सामने  वाला  सुन  न  पाया  हो या  फ़िर  समझ  न  पाया  हो उस  दो  कौड़ी  की  बात  को .  उसने   मुझसे  पूछा  था  उस  दिन ---" आप क्या  करते  हो ? मैंने  कहा  ,कुछ  नहीं ." तो  फ़िर बाहर  क्यूँ  नी  आते ? मैंने  कहा  ,यूँ  ही " शायद मेरा  जवाब  रुखा  था .

            फ़िर  करवाचौथ  पर मेरे  पैर छूने  आई ,जाने  कैसे  उसे  पता  चला  कि  मैं  उससे  बड़ी  हूँ , हमारी  इस सोसायटी  में बड़ों  के  पैर  छूने  का  चलन  है . मैं  जब  छोटी  थी  तब  समाज  में  कन्या  - बहन - भांजी  के  चरण- स्पर्श  का  चलन  था :) उस  वार्ता के  रूखे  जवाब  के अफ़सोस में या एवज  के आशीर्वाद  में  मैंने  उसे साऊथ - कॉटन  का  सूट उपहार के तौर पर  दिया तो ख़ुश  हो  गई . लेकिन  इस बार फ़िर  मुझसे   चूक  हो  गई मैनें   उसे   दरवाजे  ही से  लौटा दिया  था !

           इस   जघन्य  पाप  के  प्रायश्चित  का  मौका  काफ़ी  दिन  बाद  मिला .तब ,जब  उसके  बेटे  का बर्थडे  आया ,मुझे   सामने  वाली  खिड़की   से  न्यौता  आया ---  " आपको  शाम  को  आना  है 6  बजे , मैंने  अफ़सोस   जाहिर  किया  - मैं  थोड़ा  लेट हो  जाउंगी " शाम  को  पहले  बाजार  जाकर 400  का कैरम  बोर्ड   ख़रीदा और देकर आई तब पूरा  परिवार  फ़िर  ख़ुश  हो  गया :)

            क्या  ख़ुशी  उपहार  की  मोहताज  है ?  पड़ोसी -धर्म  यूँ  निर्वाह  किया  जाता  है ? लेन- देन हर  जगह  चलता  है . होटल  में  टिप .दफ्तर  में  घूस . बॉस  को  चमचागिरी  सास  को  चापलूस  बहू  विथ  ..... पसंद  आती  है . 
             
             अभी  धुप  का एक  बड़ा -सा  टुकड़ा  कोरिडोर  पर आया  .मेरे  पड़ोस के दरवाजे पर .दरवाज़ा  बन्द  था मैं  जाकर  खड़ी  हो गई ( एक अपराधबोध  के साथ ) अंदर  चर्चा  चल रही  थी . चर्चा  नहीं  सविता का  विश्लेषण  हो  रहा  था . उसकी  सहेलियाँ  उसीकी  खिल्ली  उड़ा  रही  थी ." मुंह  पर पुताई  करके  झाइयां  छुपाती  है  मैंने  देखा उसे  सुबह .दूसरा  स्वर अरे कोहनियाँ  एकदम  काली  हो  रक्खी  हैं .पहले  वाली  फ़िर  बोली फ़टी  हुई एडियाँ और  बर्तन वाली  बाई  जैसे  हाथ ,हा -हा - हा "और  फ़टी हुई आवज़  भूल  गई ,दूसरी  ने थेगला  लगाया "

                  धूप  चली  गई ,पर  मैं  क्यूँ  गई  ऐसी  धूप में ? जहाँ  उसपार  ऐसी  सखियाँ  थीं . क्या टाइम -पास  यूँ  किया  जाता  है ? घर  में  कदम रखा  तो बेटी  किताब  पढ़  रही थी ,अपनी  धुन में ____
           इक चिड़िया  के बच्चे  चार ..
           घर  से  निकले  पंख पसार !
           पूरब से पश्चिम  को  जाएं ...
         पश्चिम से  पूरब  को  जाएं !
             घूम  लिया  है  जग  सारा ...
            अपना  घर  है सबसे  प्यारा ! 
            " अपना घर  है  सबसे  प्यारा  " मैंने  उसके  सुर में सुर  मिलाया  वो बोली चिड़िया  का घर है भी  सबसे प्यारा और आकर लिपट  गई ..... मैं  भूल गई उस निर्दोष  स्नेहिल स्पर्श से वो  निंदा  स्तुति .... सच , अपना  घर  है सबसे प्यारा :)
____________________ डॉ. प्रतिभा स्वाति




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शुक्रवार, दिसंबर 08, 2017

सवाल ....

  पंकज ---
------------------ सवाल  , पंकज  का नहीं , तमाम  उन पुरुषों का है , जो उस जैसे हैं :) समाज  से रुष्ट ! समाज  को ठेंगा  दिखाने को उद्यत  ... आतुर ... तत्पर ...
         क्या  अंतर  का खालीपन  ऐसा  होता  है ? भीतर  के  बवाल से लबरेज हो जाने की परिणिति ऐसी होती  है ? एक  सामान्य  सहज जीवन न जी पाने से उत्पन्न  कुंठा ? पीड़ा  को  ख़ुशी  में लपेटने  की  कोशिश ? यथार्थ  से आँख मींच  लेना ?   एक  दाह ....  भभकती  आग  जो  सब  कुछ  भस्म  कर देना  चाहती  है , मगर  चुपके  से ! चाहे  वह  किसी की  निर्दोष  हंसी  हो . चाहे  किसी का बहुमूल्य  वक्त .  किसी  की सद्भावना  और सहायता का  जहाँ कोई मोल नही .
       पंकज  को  जानने  वालों  की  राय  ,उनके  पक्ष  में   बिलकुल नहीं .  मतलब  हो तब  ही  कोई  मिलता  है  मज़बूरी  में . या  कोई  अनजाने  ही  उनकी  चपेट में आ  जाए तो ,हो  जाती  है  मुलाकात . 
        क्या  कोई  इतना बुरा  हो  सकता  है , कि  लोग  कतराने  की  हद  पार  कर  जाएँ  ? 63  साल  का  बन्दा अब  अकेला  है घर  में . 2017 में  पत्नी  गुजर  गई . बेटे  ने  लवमेरिज  की शायद   त्रिवेन्द्रम  में  है ,अपनी  पत्नी  और  दो  बेटियों  के साथ ! बेटी  30  के आसपास  की  है ,उसकी  शादी  3 साल पहले  हुई थी अब तो उसका  तलाक  भी  हो गया ,दिल्ली  में जॉब  कर  रही  है .और  हमारे  पात्र  पंकज  आगरा  में  लोगों  को पका  रहे  हैं !
लोगो  का  कहना  है ____  बहुत  बोलते  हैं  भई  ,अपने  आगे किसी  की सुनते  ही नही ! कोई कहता है __ इतना बड़ा  बकैत  ,यार फ़ोन  करने में डर लगता  है , चिपकू है स्याला ... सठिया  गया  है . कोई  कहता है __ अंकल झूठ बहुत बोलते ,किसी  का कहना है __ निरर्थक  वार्ता में  पारंगत हैं पंकज और अपनी लम्बी  बात के बीच में कोई बोले तो उसे गाली तक दे  डालते हैं ,भला  ये कहाँ का मैनर्स  है ?
            वैसे  लोग बोलते  तो  सच  ही है .पतले - 2 हाथ -  पैर , बाहर  निकला बड़ा - सा पेट , गंजा होता  सिर और थोड़ा   लंगड़ाती  चाल वाले वे ,जब अपने आपको  हैण्डसम  कहें , शादी - बारात में  डांस करें तब कोई कैसे   झेले ? वे खाने - पीने के शौक़ीन  हैं .
___________ मेरा पात्र इतना बुरा ? ना जी ना :) वे  खाना  अच्छा बनाते  हैं , चाय  बहुत  ही अच्छी . सुबह 4 बजे  जागते  हैं . पौधों से बहुत लगाव है और..... बस :)     
 आप  मिलना  चाहेंगे पंकज से ? नहीं ? आख़िर  क्यूँ  नहीं ? वे आपको मिल सकते हैं  वाट्सप पर और शादी डॉट कॉम पर ..... :)
------------------- ( बिना  भूमिका के अपनी  कहानी  की  शुरुआत  के लिए मुआफ़ी  चाहूंगी , पर    {सवाल  - मेरा  कथा संग्रह } पात्र  आपसे  मुखातिब  हो रहे  हैं ! हर  रोज एक नया किरदार ! और  मैं    मिल रही  हूँ सबसे .... सच में )
____________________  डॉ . प्रतिभा स्वाति  



शनिवार, नवंबर 18, 2017

मंगलवार, सितंबर 12, 2017

मुद्राएँ ......


हमारा  शरीर  पंच - तत्वों से  बना है  ---------



हाथ की अंगुलियाँ  और अंगूठा इन पंच -तत्वों का ख़ुलासा  करते हैं  :)




  अंगुली और अंगूठे से मिलकर  बनाई  जाती  है योग और नृत्य  में -- "मुद्राएँ " 















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