गुरुवार, सितंबर 12, 2013

आज इतना ही ...

              ओह , जब  भी कोई खयाल परिपक्व नहीं होता. उसे ज़ाहिर करने में बड़ा जोखिम है. वो बिखरता है --------- जैसे सुरभित पवन में पुष्पों के परागकण . उपवन  को तब क्या हासिल होता है ? बस , उस पुष्प -गुच्छ की परवरिश का श्रेय और सम्मान  ही या कुछ और भी ?
                   आख़िर मै पूछ  किससे रही हूँ ? ख़ुद ही से ? तो फिर मै जवाब क्यूँ नहीं देती ख़ुद को ?
जवाब  जब तैयार  हों , तब उन्हें देने की जल्दी क्यूँ ? उन्हें एक योजना के तहत / स्थिति  के अनुकूल  होने पर , उचित  अवसर मिले तब ज़ाहिर किया जाना ठीक है -------- एक खुबसूरत शक्ल में :)
                      वो शक्ल गीत की हो / या कहानी की . क्या इससे फर्क पड़ता है ? इससे  क्या  फ़र्क पड़ता है ?
------------------------------- डॉ . प्रतिभा स्वाति
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