मंगलवार, मई 31, 2016

fb times / प्रथम अंक

1.                रचनाकार अपनी रचना पर अपना अधिकार ,अपना नाम चाहता है ,इसलिए वह 'कॉपी  राईट एक्ट " को समर्थन देता है  fb पर 'कॉपी पेस्ट' एक्ट काम करता है !
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” क्रोध में लोग एक दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं ?’
शिष्य कुछ देर सोचते रहे ,एक ने उत्तर दिया, ” क्योंकि हम क्रोध में शांति खो देते हैं इसलिए !”
” पर जब दूसरा व्यक्ति हमारे सामने ही खड़ा है तो भला उस पर चिल्लाने की क्या ज़रुरत है , जो कहना है वो आप धीमी आवाज़ में भी तो कह सकते हैं “, सन्यासी ने पुनः प्रश्न किया .
कुछ और शिष्यों ने भी उत्तर देने का प्रयास किया पर बाकी लोग संतुष्ट नहीं हुए .
अंततः सन्यासी ने समझाया …
“जब दो लोग आपस में नाराज होते हैं तो उनके दिल एक दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं . और इस अवस्था में वे एक दूसरे को बिना चिल्लाये नहीं सुन सकते ….वे जितना अधिक क्रोधित होंगे उनके बीच की दूरी उतनी ही अधिक हो जाएगी और उन्हें उतनी ही तेजी से चिल्लाना पड़ेगा.
क्या होता है जब दो लोग प्रेम में होते हैं ? तब वे चिल्लाते नहीं बल्कि धीरे-धीरे बात करते हैं , क्योंकि उनके दिल करीब होते हैं , उनके बीच की दूरी नाम मात्र की रह जाती है.”
सन्यासी ने बोलना जारी रखा ,” और जब वे एक दूसरे को हद से भी अधिक चाहने लगते हैं तो क्या होता है ? तब वे बोलते भी नहीं , वे सिर्फ एक दूसरे की तरफ देखते हैं और सामने वाले की बात समझ जाते हैं.”


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1 जून 2016 

फ़ेसबुक पर तमाम मित्र कुछ  ऐसी चुटकुले बाज़ी करते हैं कि आप बरबस ही मुस्कुरा दें ,जैसे आज -----------------

मुझे तो बस इतना ही काफी लगा की बस - "इनसान ही कमाता है :)"



आज fb की न्यूज़  फ़ीड पर इसे तीन अलग -अलग लोगों ने post किया . 
ऐसे में मुझे एक सबक़ मिला कि .....frndlist में तीन में से एक ही रखा जाए.
जो सच्चा है ,वही अच्छा है !





हर ज़ुल्म तेरा याद है....









my e-book: माँ / अस्वीकार क्या कहूँ ....:



  करता है ज़ुर्म छुपकर , गुनहगार क्या  कहूँ !
 सुबूत के अभाव में सच जाता है हार क्या कहूँ !


सोमवार, मई 30, 2016

वो मौसम है ....






मेरे  दिल का टुकड़ा ही , मुझको छलता है !
जैसे कोई  मौसम है , जो रोज़  बदलता है !

इक  गुनाह  माफ़ करती हूँ , आह भूलकर !
 और इक  को भूल जाती हूँ , चाह  भूलकर !

पर वो  बदगुमान  इस कदर हो गया  है !
जिसे दिया था  जनम ,  वो  खो गया है !

__________________________ डॉ . प्रतिभा स्वाति





रविवार, मई 29, 2016

नायरा और रूही ..... कब करेंगी माँ की इज्जत ?

      सच पूछिए तो हमारे tv सीरियल कम्म्मम्म्माल  के हैं . किरदार उनमें काम करते -करते ही बड़े हो जाते हैं उनकी एक छवि बन जाती है . सालों -साल चलने वाले ये टीवी सीरियल हमारी बोर होती बहू - बेटियों को घर में उलझाए रखते  हैं . मैं कलर्स की  आनंदी या ज़ी की सिमरन की या ज़िंदगी की फेरिहा या ....... की बात फ़िलहाल नहीं करुँगी ! नहीं करुँगी उड़ान की चकोर या दिया -बाती की संध्या या किसी भी ' सुहानी 'सी लड़की की या धरा की ......omg / मुझे कितने सारे नाम याद हो गए ! मैंने कितना वक्त जाया कर दिया टीवी पर , मुए इन सीरियल वालों का सत्यानाश हो :)
_________________ नायरा और रूही कुछ महीनों पहले तक तो ठीक थीं ! सबकी चहेती वो आज भी हैं ! पर उनकी माँ उनके लिए परेशान हैं ! वो अपनी माँ से अब नफ़रत कर रही हैं ! और उन्हें देखकर आपकी बेटी क्या सीख रही है ?
____________________ यही की आगरा  थाने पर एक माँ ने शिकायत दर्ज़ करवाई की उसकी बेटी उसके नियन्त्रण में नहीं ! तब मुझे बेटी के पिता का खयाल नहीं आया ! क्या वो सावधान इण्डिया में डूबा होगा ? ये बात अभी खत्म नहीं हुई ,वक्त आज का खत्म हुआ है ! इस post को edit करते समय मैं सीरियल के नहीं हक़ीकत  के कुछ प्रमाण चस्पा करूंगी ! फ़िलहाल इस कहानी को यूँ ही बहने दें ....हवा की तरह , नदी की तरह नहीं :)
__________________________ डॉ. प्रतिभा स्वाति







गुरुवार, मई 26, 2016

आज नहीं...













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बो दिए हैं  बीज मैंने, 
उगाउंगी  मैं ही फ़सल !
फूल फल नज्र सबको ,
आज नहीं कल ,कल !
_________________________ डॉ .प्रतिभा स्वाति




बोती हूँ शब्द ....











गुज़रे  यूँ  ज़िन्दगी के 
  बरस ,माह और पल  !
  सौ  बार गिरे गर तो ,
सौ बार गए सम्हल !

गम और ख़ुशी जैसे 
पर्याय  हो  गए हैं !
अश्रु हंस दिए  हैं ?
या ख़ुशियाँ हैं विकल ?

सतत बो रही हूँ शब्द ,
उग रही  हैं ग़ज़ल !
गीत ,कथा ,छंद सब 
 है अर्थों  की फ़सल !

धूप कई  ख्वाबों  की ,
कई रिश्तों की बारिश !
तज़ुर्बों की जमीं पर ,
 कई मौसम  गए बदल !

कुछ गीत  खिल  गए ,
मुक्तक बिखर  गए !
जिंदगी की किताब से ,
कई पन्ने  गए  निकल !

जोड़ गुणा भाग किया 
घट  गया सब  कैसे ?
सिफ़र लिए  हाथों में 
आँखों में लिए जल !

शब्द  मूक  हो गए ,
अर्थ वाचाल ,विकल !
सौ समस्या चाहती हैं 
बस हो एक ही हल !

बातों  के  भँवर  हैं, 
गुस्ताख़  हैं अदब !
कुछ बदगुमान मैं हूँ ,
इबारतों के शगल !

बो दिए हैं  बीज मैंने, 
उगाउंगी  मैं ही फ़सल !
फूल फल नज्र सबको ,
आज नहीं कल ,कल !
_________________________ डॉ .प्रतिभा स्वाति


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