बुधवार, जून 27, 2018

क्षणिक हताशा ...

 वो  दिल  में बसे  हैं ...
लोग  कहते  खो  गए !
अश्रु हर अनमोल  है ...
मुझसे  जाया  हो गए !







      ओह ! इन्सान  जो  जीता  है  वही  लिखता  है ( जब  दिल  से  लिखा  जाता  है )  लेकिन  जब  दिमाग  से  कलम  चलती  है  तब  , वह  जो  सोचता  है  वो लिखता है . जो  वह  चाहता  है  वो  लिखता  है !

       लिखने  वाला जब अपनी अभिव्यक्ति लेखन के मार्फत सार्वजनिक  कर  देता है तब ..... पाठक  पर जो  गुज़रती  है  वह  कभी  सच  नहीं  कहता :) fb पर like और वाह -वाह के कमेन्ट  ठोके  जाते  हैं ! कोई आलोचना  करे  भी  तो  क्यूँ आख़िर ? block  होने  का रिस्क ! विवाद  होने  का  डर !

               ऐसा  कविता  के  सन्दर्भ में  होता  है . यदि  पोस्ट राजनीति या धर्म  से संदर्भित  हो , तब  मुलाहिजा  ज़रा  कम  किया  जाता  है . विवाद  से  डर  नहीं  लगता . न  ही  तब  कोई  किसी  को block   करता  है !

             जो  भी  वजह  हो पाठक  को दोनों स्थितियों  में सम्वेदनशील  होना चाहिए ! और लेखक  को हमेशा  ज़रा  सावधान :) और  दोनों  ही  को वक्त  की अहमियत को  समझने  की ज़ुरूरत  नहीं  है क्या ? पूरी  ज़िन्दगी में से आधी  सोकर  गुज़ारने  वाले  हम ... अपने  देश  को  क्या दे  रहे हैं ? और  क्या  उम्मीद  लगाए  बैठे  हैं ? ये सवाल जब जेहन में उठता  है तब हताशा  के उन क्षणों  में  मैं आध्यात्मिक हो जाती  हूँ ..... फ़िर  उर्जावान ..... फ़िर एक सकारात्मकता  मुझे नव  - सृजन  के लिए  प्रेरित  करती  है :) क्या  आपके साथ  भी ऐसा  होता  है ? क्या  यही  हैं मसर्रत और  गम  के रिश्ते ? 
__________________ डॉ .प्रतिभा स्वाति 


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