रविवार, जून 29, 2014

मधुबाला

 _____________जहाँ तक मुझे मालूम है , हिंदी साहित्य में बच्चन जी ने ' हालावाद ' ही चला दिया था ! मधुबाला
मधुशाला 
मधुकलश  
------------------ इन 3 रचनाओं के माध्यम से ! समीक्षक , मीनमेख निकालते रहे , तब भी और अब भी .किसी भी वस्तु या व्यक्ति की आलोचना करना बहुत सरल है ( शायद इसलिए की हम सब एक दूसरे से भिन्न हैं , और इसीलिए दूसरे को सहजता से स्वीकार पाना जरा मुश्किल है ) .
         इसीलिए / ऐसी स्थिति  में ' सकारात्मक सोच " का स्लोगन एक समाधान साबित हुआ :)
------------------ ये सही है ,हाला का अर्थ ' मदिरा ' है !
---------- कानून और   समाज इसके  खिलाफ है ! किन्तु साहित्य में /इसपर लिखा गया !
------------ क्या ,तब समाज में /ये सब घटित हो रहा था ? या समाज उस ओर उन्मुख हो रहा था ? समाज में ऐसी कृतियों की ज़ुरूरत थी ,विकास या मनोविलास के लिये ? या फिर ये लेखक की एक सहज अभिव्यक्ति थी ,जिसे सहजता से स्वीकारा जाना चाहिये था !
जो भी हो / शब्द चयन उत्कृष्ट था ! अभिव्यक्ति पुरज़ोर थी ! सार्थकता पर यदि प्रश्नचिन्ह हैं या थे तो भी मैं 'सकारात्मकता की ओट में न सिर्फ़ विराम लूंगी अपितु ' मधुबाला ' के कुछ अंश कॉपी पेस्ट भी करुँगी ----------------- डॉ . प्रतिभा स्वाति 
_____________________________
1
मैं मधुबाला मधुशाला की,
मैं मधुशाला की मधुबाला!
मैं मधु-विक्रेता को प्यारी,
मधु के धट मुझ पर बलिहारी,
प्यालों की मैं सुषमा सारी,
मेरा रुख देखा करती है
मधु-प्यासे नयनों की माला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!
2
इस नीले अंचल की छाया
में जग-ज्वाला का झुलसाया
आ कर शीतल करता काया,
मधु-मरहम का मैं लेपन कर
अच्छा करती उर का छाला।
मैं मधुशाला की मधुबाला!

----------------------------------- ' मधुबाला ' के और भी कुछ अंश मै कॉमेंट्स में देती रहूंगी :)
________________________ प्रस्तुति : डॉ. प्रतिभा स्वाति
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