बुधवार, जून 25, 2014

लौ यादों की ....

     

       कई बार लिखने को बहुत कुछ होता है / पर हम नहीं लिख पाते !
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 गुलाबी कागज़ भी हो !
   और रोशनाई भी हो !
दिल में ख़ुदा भी हो --
साथ खुदाई  भी  हो !
................................. पर फ़िर भी ....ख्याल / लफ्ज़ों की शक्ल नही ले पाते ...

------------ ऐसा / तब होता है जब बाहर का शोर , भीतर की आवाज़ नही सुनने देता ! 

................. ओह / सचमुच एकान्त बहुत ज़ुरुरी है ! सही कह गए हैं बुज़ुर्ग ------ भजन , भोजन , शयन , अध्ययन , चिन्तन / बिना एकान्त के नही किये जाने चाहिये !
---------------------- डॉ. प्रतिभा स्वाति

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