शनिवार, मई 10, 2014

बचपन




 गुड्डे -  गुड़िया !
खेले  थे घर - घर !
अब गया बिसर !

बीतें जो पल !

वो यादें बनकर !
छा जाएँ मन पर !
----------------------- डॉ. प्रतिभा स्वाति 

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