सोमवार, दिसंबर 02, 2013

हमारा होना / न होना

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क्यूँ  अक्सर !
यूँ  जागकर !
गुनती  हूँ कुछ ,
मन  ही  मन !
बुनती हूँ  कुछ ,
मन  ही मन !
बिन किये जतन !!

रात  है  अगर / तो
मैं  सोती  क्यूँ  नहीं  ?
गम  है  कोई  अगर ,
तो  मैं रोती क्यूँ नही ?
न हंसती / न  रोती !
चैन  जो मिला नहीं ,
फिर कैसे रोज़ खोती ?

उसके  खयाल / मुझे
'मैं ' नही रहने  देते !
दर्दोंगम  का दरिया ,
क्यूँ नही बहने देते !

अब / तुम लौटो ज़रा !
बहुत  अर्सा गुज़रा यूँ !
मुझसे मिलना है मुझे !
या / रहने दो , फिर ,
तुमसे मिलने के लिए ,
अब / ज़ुरूरी नही---
तुम्हारा होना !!
फिर मेरे होने की
अब / ज़ुरूरत क्या है ?
------------------------------ डॉ . प्रतिभा स्वाति\

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