मंगलवार, सितंबर 03, 2013

आधुनिक हाईगा

जब भी कोई नया प्रयोग होता है , उसकीआलोचना के रास्ते खुल जाते हैं .तब उसे सोने को खरा करने की प्रक्रिया में शामिल कर लेती हूँ ! और फिर जब स्वीकार की जड़ें गहरी हों , तब अस्वीकार की बयार भी मन को गुदगुदाती है . आख़िर क्यूँ नही चढ़ पाया ' हाइकू' जन -मानस की जुबान पर ? क्यूँ हाइकू दूसरे देश से आकर यहाँ अज़नबी है ? ये मेरे मन में मुस्कुराते जवाबों के सवाल हैं ! जो आपके सामने तनकर खड़े हैं ! haiga को नए कलेवर में लेकर ! thnx ! ------------------------ डॉ . प्रतिभा स्वाति


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